________________ 84] [सूर्यप्रज्ञप्तिसूत्र 27. ता उत्तरासाढा खलु णक्खत्ते उभयंभागे दिवड्डखेत्ते पणयालीस-मुहत्ते तपढमयाए पाओ चंदेण सद्धि जोयं जोएइ, अवरं च राई तओ पच्छा अवरं च दिवस, एवं खलु उत्तरासाढा गक्खत्ते दो दिवसे एगं च राई चंदेण सद्धि जोयं जोएइ, जोयं जोइत्ता जोयं अणुपरियट्टइ, जोयं अणुपरियट्टित्ता सायं चंदं अभिई सवणाणं समप्पेइ / ' 1. सूत्रांक 10 से 27 पर्यन्त में मूलपाठ सूर्यप्रज्ञप्ति की टीका से यहाँ उद्धत किया है। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org