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________________ दशम प्राभृत [पंचम प्राभृतप्राभूत णक्खत्ताणं कुलोवकुलाई:-- 37. ता कहं ते कुला (उवकुला, कुलोवकुला) ? आहिए त्ति वएज्जा।' तत्थ खलु इमे बारस कुला, बारस उवकुला, चत्तारि कुलोवकुला पण्णत्ता। बारसकुला पण्णत्ता तं जहा 1. धणिट्ठा कुलं 2. उत्तराभवया कुलं 3. अस्सिणी कुलं 4. कत्तियाकुलं 5. मिगसिरकुलं 6. पुस्सकुलं 7. महाकुलं 8. उत्तराफग्गुणी कुलं 6. चित्ताकुलं 10. विसाहाकुलं 11. मूलंकुल 12. उत्तरासाढाकुलं / बारस उवकुला पण्णत्ता तं जहा--- 1. सवणो उवकुलं 2. पुव्वापोट्ठवयाउवकुलं 3. रेवई उवकुलं 4. भरणी उवकुलं 5. रोहिणी उवकुलं 6. पुणव्वसु उबकुल 7. अस्सेसा उवकुलं 8. पुव्वाफग्गुणी उवकुलं . हत्थो उवकुलं 10. साती उपकुलं 11. जेट्ठा उवकुलं 12. पुव्वासाढा उवकुलं। चत्तारि कुलोचकुला पण्णत्ता तं जहा-- 1. अभियी कुलोवकुलं 2. सतभिसया कुलोवकुलं 6. अद्दा कुलोवकुलं 4. अणराहा कलोवकुलं / 1. सूर्यप्रज्ञप्ति में प्रस्तुत प्रश्नसूत्र खण्डित है, अतः कोष्ठक के अन्तर्गत “उवकुला, कुलोवकुला" अंकित करके उसे पूरा किया है, जम्बूद्वीपप्रज्ञप्ति वक्ष०७ सूत्र 161 में, यह प्रश्नसूत्र इस प्रकार हैप्र० कति गं भंते ! कुला ? कति उवकुला? कति कुलोबकुला पण्णता? उ० गोयमा ! बारस कुला वारस उवकुला, चत्तारि कुलोवकुला पण्णत्ता / शेष पाठ सूर्यप्रज्ञप्ति के समान है, किन्तु जम्बूद्वीपप्रज्ञप्ति के इस प्रश्नोतर सूत्र में बारह कुल नक्षत्रों के नामों के बाद कुलादि के लक्षणों की सूचक एक गाथा दी गई है जो सूर्यप्रज्ञप्ति की टीका में भी उद्धृत है और यह गाथा प्रस्तुत संकलन में भी उद्धत है। जम्बूद्वीपप्रज्ञप्ति के संकलनकर्ता यदि यह गाथा प्रस्तुत सूत्र के प्रारम्भ में या अन्त में देते तो अधिक उपयुक्त रहती। गाहा–मासाणं परिणामा, होति कुला, उवकुला उ हेट्टिमगा। होति पुण कुलोवकुला, अभियी-सयभिसय-ग्रह-अणुराहा / -~~-जंबु. वक्ख. ७,सु. 161 "कि कुलादीनां लक्षणम् ? उच्यते-मासानां परिणामानि-परिसमापकानि भवन्ति कुलानि, कोऽर्थः ? इह यनक्षत्रैः प्रायो मासानां परिसमाप्तय: उपजायन्ते माससदृशनामानि च तानि नक्षत्राणि कुलानीति प्रसिद्धानि / " "कुलानामधस्तनानि नक्षत्राणि श्रवणादीनि उपकुलानि, कुलानां समीपमुपकुलं तत्र वर्तन्ते यानि नक्षत्राणि तान्युपचारादुपकुलानि / " "यानि कुलानामुपकुलानां चाधस्तनानि तानि कुलोपकुलानि / ' - जम्बू. टीका. Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003484
Book TitleAgam 16 17 Suryaprajnapti Chandraprajnapti Sutra - Swe Mu Pu Agam 16 17
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Kanhaiyalal Maharaj, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1989
Total Pages300
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size7 MB
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