________________ नवम प्राभृत] तत्थ गं गोल-छाया अट्टविहा पण्णत्ता, तं जहा 1. गोल-छाया 2. अवत-गोल-छाया 3. गाढ-गोल-छाया 4. अव-गाढ-गोल-छाया 5. गोलावलि-छाया 6. अवड्ड-गोलावलि-छाया 7. गोलपुंज-छाया 8. अवड्ड-गोल-पुज-छाया।' 00 1. प्रस्तुत सूत्र में छाया के पच्चीस प्रकार तथा गोल छाया के आठ प्रकार का कथन है। 'तत्थेत्यादि, तत्रतासा पंचविशति-छायानां मध्ये खल्वियं गोल-छाया अष्टविधा प्रज्ञप्ता / ' सूर्य-प्रज्ञप्ति की टीका के इस कथन से प्रतीत होता है कि छाया के पच्चीस प्रकारों में 'गोल-छाया' का नाम था और उसके पाठ प्रकार भिन्न थे, किन्तु सूर्यप्रज्ञप्ति की '1. प्रा. स.। 2. शा. स.। 3. अ. सु.।' इन तीन प्रतियों में छाया के केवल सत्तरह नाम हैं और गोल-छाया के पाठ नाम है / इस प्रकार पच्चीस पूरे नाम लिये गये हैं। सत्तरह नामों में गोल-छाया का नाम नहीं है, फिर भी 'तत्थेत्यादि' पाठ से संगति करके पच्चीस नाम पूरे मानना आश्चर्यजनक है। एक 'ह. .' प्रति में छाया के पच्चीस नाम तथा गोल-छाया के आठ नाम हैं, जो मूल पाठ के अनुसार हैं। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org