________________ [सूर्यप्रज्ञप्तिसूत्र वयं पुण एवं क्यामो, जंसि गं पव्वयंसि सूरियस्स लेस्सा पडिहया, से ता मंदरे वि पवुच्चइ जाव पन्वयराया वि पच्चइ,' [क] ता जे णं पुग्गला सूरियस्स लेस्स फुसंति ते णं पुग्गला सूरियस्स लेस्सं पडिहणंति, [ख] अदिट्ठा वि णं पुग्गला सूरियस्स लेस्सं पडिहणंति, चरिमलेस्संतरगया वि पुग्गला सूरियस्स लेस्सं पडिहणंति / 1. मंदरस्स णं पब्वयस्स सोलस नामधेज्जा पण्णत्ता, तं जहा गाहामो-- 1. मंदर 2. मेरू 3. मणोरम 4. सुदंसण 5. सयंपभे य 6. गिरिराया। 7. रयणुच्चय 8. पियदसण 9-10. मज्झे लोगस्स, नाभी य // 1 // 11. अच्छे य 12. सूरियावत्ते 13. सूरियावरणे ति य / 14. उत्तमे य 15. दिसादी य 16. बडेंसेइ य सोलसे // 2 // __ क-सम. स. 16, सु. 3 ख-जंबू. वक्ख. 4, सु. 109 इन दोनों गाथाओं में 'मंदर पर्वत' के सोलह नाम गिनाये हैं, यहाँ इनके अतिरिक्त चार प्रौपमिक नाम और भी हैं। मन्दर पर्वत के इन बीस पर्यायवाची नामों को अन्यान्य मान्यतावाले भिन्न भिन्न पर्वत मानते हैं। किन्तु सूर्यप्रज्ञप्ति के संकलनकर्ता ने समवायांग और जम्बूद्वीप-प्रज्ञप्ति के अनुसार मन्दर पर्वत के ये बीस पर्यायवाची नाम मानकर सभी अन्य मान्यतामों का 'समन्वय' किया है। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org