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________________ 108] [ प्रज्ञापनासूत्र इनके बद्ध-मुक्त प्राहारक-तैजसकामण शरीर इनके प्राहारकशरीरों की प्ररूपणा नैरयिकों की तरह, बद्ध तैजस-कार्मण बद्धवैक्रियशरीरों की तरह, तथा इनके मुक्त तैजस-कार्मणशरीरों की प्ररूपणा औधिक मुक्त तेजस के समान समझनी चाहिए।' एकेन्द्रियों के बद्ध-मुक्त शरीरों की प्ररूपणा 614, [1] पुढविकाइयाणं भंते ! केवतिया पोरालियसरीरगा पण्णता ? गोयमा! दुविहा पण्णत्ता। तं जहा-बद्धल्लया य मक्केल्लया य / तत्थ गंजे ते बद्धलगा ते णं असंखेज्जा, असंखेज्जाहिं उस्सप्पिणि-ओसप्पिणीहि अवहीरंति कालतो, खेत्तनो असंखेज्जा लोगा। तत्थ णं जे ते मुक्केल्लगा ते णं प्रणता, अणताहि उस्सप्पिणि-श्रोसप्पिणीहि प्रवहीरंति कालो, खेत्तो अणंता लोगा, अभवसिद्धिएहितो अणंतगुणा, सिद्धाणं अणंतभागो। [914-1 प्र.] भगवन् ! पृथ्वीकायिकों के कितने औदारिक शरीर कहे गए हैं ? [914-1 उ.] गौतम ! (वे) दो प्रकार के कहे गये हैं—बद्ध और मुक्त / उनमें जो बद्ध हैं, वे असंख्यात हैं। काल की अपेक्षा से—(वे) असंख्यात उत्सपिणियों और अवसर्पिणियों से अपहृत होते हैं। क्षेत्र की अपेक्षा से वे असंख्यात लोक-प्रमाण हैं। उनमें जो मुक्त हैं, वे अनन्त हैं / कालतः (बे) अनन्त उत्सपिणियों और अवसपिणियों से अपहृत होते हैं। क्षेत्रतः (वे) अनन्तलोक-प्रमाण हैं / (द्रव्यत: वे) अभव्यों से अनन्तगुणे हैं, सिद्धों के अनन्तवें भाग हैं। [2] पुढविकाइयाणं भंते ! केवतिया वेउब्वियसरीरया पण्णत्ता ? गोयमा ! दुविहा पण्णत्ता। तं जहा-बद्धलगा य मुक्केल्लगा य / तत्थ णं जे ते बद्धल्लगा ते णं णस्थि / तत्थ णं जे ते मुक्केल्लगा ते णं जहा एतेसिं चेव ओरालिया भणिया तहेव भाणियन्या / [914-2 प्र.] भगवन् ! पृथ्वीकायिकों के वैक्रिय शरीर कितने कहे गये हैं ? [614-2 उ.] गौतम! (वे) दो प्रकार के कहे गए हैं-बद्ध और मुक्त / उनमें जो बद्ध हैं, वे इनके नहीं होते। उनमें जो मुक्त हैं, उनके विषय में, जैसे इन्हीं के औदारिकशरीरों के विषय में कहा गया है, वैसे ही कहना चाहिए। [3] एवं प्राहारगसरीरा वि। _ [914-3] इनके पाहारकशरीरों की वक्तव्यता इन्हीं के वैक्रियशरीरों के समान समझनी चाहिए। [4] तेया-कम्मगा जहा एतेसि चेव पोरालिया। [614-4] (इनके बद्ध-मुक्त) तैजस-कार्मणशरीरों (की प्ररूपणा) इन्हीं के बद्ध-मुक्त औदारिक शरीरों के समान समझनी चाहिए। - - --- ----- 1. प्रज्ञापनासूत्र मलय. वृत्ति, पत्रांक 276-277 Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003483
Book TitleAgam 15 Upang 04 Pragnapana Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorShyamacharya
AuthorMadhukarmuni, Gyanmuni, Shreechand Surana, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1983
Total Pages1524
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size37 MB
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