________________ 46] [प्रज्ञापनासूत्र वे ग्रहण किये हों, उन सब पुद्गलों के पिण्ड का उसी रूप में (ज्यों-का-त्यों) निर्गमन होता है, अर्थात् वक्ता भाषावर्गणा के पुद्गलों के पिण्ड को अखण्डरूप में ही बाहर निकालता है, वह पिण्ड अमुक योजन जाने के बाद ध्वस्त हो जाता है, (उसका भाषारूप परिणमन समाप्त हो जाता है)। (2) वक्ता यदि गृहीत पुद्गलों को भेद (विभाग) करके निकालता है तो वे पिण्ड सूक्ष्म हो जाते हैं, शीघ्र ध्वस्त नहीं होते, प्रत्युत सम्पर्क में आने वाले अन्य पुद्गलों को वासित (भाषारूप में परिणत) कर देते हैं। इस कारण अनन्तगुणे बढ़ते-बढ़ते वे लोक के अन्त का स्पर्श करते हैं। * भाषा पुद्गलों का ऐसा भेदन खण्ड, प्रतर, चूणिका, अनुतटिका और उत्करिका, यों पांच प्रकार से होता है, यह दृष्टान्त तथा अल्पबहुत्व के साथ बताया है।' 1. (क) पण्णवणासुतं भा. 1 (ग) विशेषा. गा. 378 (ख) पण्णवणासुत्तं भा. 2, भाषापद की प्रस्तावना 84 से 88 तक (घ) प्रज्ञापना. म. व. पत्र 265 (अ) प्रावश्यक नियुक्ति गा. 7 भावापद की अलावा य से ना.. For Private & Personal Use Only Jain Education International www.jainelibrary.org