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________________ बसवां परमपव] [31 796. परिमंडले णं भंते ! संठाणे असंखेज्जपदेसिते असंखेज्जपएसोगाढे कि चरिमे० पुच्छा। गोयमा! असंखेज्जपदेसिए असंखेज्जपदेसोगाढे नो चरिमे जहा संखेज्जपदेसोगाढे (सु. 768) / एवं जाव प्रायते / [799 प्र.] भगवन् ! असंख्यातप्रदेशी एवं असंख्यात प्रदेशों में अवगाढ़ परिमण्डलसंस्थान चरम है, अचरम है, अनेक चरमरूप है, अनेक अचरमरूप है, चरमान्त प्रदेश है अथवा अचरमान्त प्रदेश है ? [799 उ.] गौतम ! असंख्यातप्रदेशी एवं असंख्यातप्रदेशावगाढ़ परिमण्डलसंस्थान चरम नहीं है, इत्यादि समग्र प्ररूपणा सू. 798 में उल्लिखित संख्यातप्रदेशावगाढ़ की तरह समझना चाहिए / इसी प्रकार (को प्ररूपणा) यावत् आयतसंस्थान तक (करनी चाहिए / ) 800. परिमंडले णं भंते ! संठाणे अणंतपएसिए संखेज्जपएसोगाढे कि चरिमे० पुच्छा / गोयमा ! तहेव (सु. 767) जाव प्रायते / [800 प्र.] भगवन् ! अनन्तप्रदेशी और संख्यातप्रदेशावगाढ़ परिमण्डलसंस्थान चरम है, अचरम है, (इत्यादि पूर्ववत्) पृच्छा (का क्या समाधान ?) [800 उ.] गौतम ! इसकी प्ररूपणा सू. 797 के अनुसार संख्यातप्रदेशी संख्यातप्रदेशावगाढ़ के समान यावत अायतसंस्थान पर्यन्त समझनी चाहिए। 801. अणंतपदेसिए असंखेज्जपदेसोगाढे जहा संखेज्जपदेसोगाढे (सु. 800) / एवं जाव प्रायते। 801] जैसे (सू. 800 में) अनन्तप्रदेशी संख्यातप्रदेशावगाढ़ (परिमण्डलादि संस्थानों के चरमाचरमादि के विषय में कहा,) उसी प्रकार अनन्तप्रदेशी असंख्यातप्रदेशावगाढ़ (परिमण्डलादि के विषय में) यावत् आयतसंस्थान (तक कहना चाहिए / ) 802. परिमंडलस्स णं भंते ! संठाणस्स संखेज्जपएसियस्स संखेज्जपएसोगाढस्स अचरिमस्स य चरिमाण य चरिमंतपदेसाण य अचरिमंतपदेसाण य दवट्टयाए पदेसट्टयाए दन्वटुपदेसट्टयाए कतरे कतरेहितो अप्पा वा 4 // गोयमा ! सम्वत्थोवे परिमंडलस्स संठाणस्स संखेज्जपदेसियस्स संखेज्जपदेसोगाढस्स दवट्टयाए एगे अचरिमे 1 चरिमाइं संखेज्जगुणाई 2 अचरिमं च चरिमाणि य दो वि बिसेसाहियाई 3 / पदेसट्टयाए सव्यस्थोवा परिमंडलस्स संठाणस्स संखेज्जपदेसियस्स संखेज्जपदेसोगाढस्स चरिमंतपदेसा 1 प्रचरिमंतपदेसा संखेज्जगुणा 2 चरिमंतपदेसा य अचरिमंतपदेसा य दो वि विसेसाहिया 3 / दबटुपदेसट्टयाए सम्वत्थोवे परिमंडलस्स संठाणस्स संखेज्जपवेसियस्स संखेज्जपदेसोगाढस्स दबट्टयाए एगे प्रचरिमे 1 चरिमाइं संखेज्जगुणाई 2 अचरिमं च चरिमाणि य दो वि विसेसाहियाई 3 चरिमंतपदेसा संखेज्जगुणा 4 प्रचरिमंतपएसा संखेज्जगुणा 5 चरिमंतपदेसा य अचरिमंतपदेसा य दो वि विसे साहिया 6 / एवं बट्टतंस-चउरंस-प्रायएसु वि जोएप्रव्वं / [802 प्र.] भगवन् ! संख्यातप्रदेशी संख्यातप्रदेशावगाढ़ परिमण्डलसंस्थान के अचरम, अनेक Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003483
Book TitleAgam 15 Upang 04 Pragnapana Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorShyamacharya
AuthorMadhukarmuni, Gyanmuni, Shreechand Surana, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1983
Total Pages1524
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size37 MB
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