________________ 22] [प्रज्ञापनासूत्र 388181 है, 11. कथंचित् चरम और प्रवक्तव्य है, 12. कथंचित एक चरम / और अनेक अवक्तव्यरूप 8818_ है, 13. कथंचित अनेक चरमरूप और एक प्रवक्तव्यरूप 1000 14. कथंचित अनेक चरमरूप और अनेक प्रवक्तव्यरूप |000 15. न तो (वह) एक अचरम और एक प्रवक्तव्य है, 16. न एक अचरम और अनेक अवक्तव्यरूप है, 17. न अनेक अचरमरूप और एक प्रवक्तव्यरूप है, (और) 18. न ही अनेक अचरमरूप और अनेक प्रवक्तव्यरूप है, (किन्तु) 19. कथंचित चरम, अचरम और प्रवक्तव्य ! |8| है, 20. कथंचित् एक चरम, एक अचरम और अनेक अवक्तव्य रूप है, 21. कथंचित् एक चरम, अनेक अचरमरूप और एक प्रवक्तव्य 0 / 0 है, 22. कथंचित एक चरम, अनेक अचरमरूप और अनेक प्रवक्तव्यरूप 0 0 00 है, 23. कथंचित अनेक चरमरूप, एक अचरम और एक अवक्तव्य का है, 24. कथंचित अनेक चरमरूप, एक अचरम और अनेक प्रवक्तव्यरूप: है, 25. कथंचित अनेक चरमरूप, अनेक अचरमरूप और एक प्रवक्तव्य या है, और कचित् अनेक चरमरूप, अनेक अचरमरूप और अनेक प्रवक्तव्यरूप: 0018 है। 786. संखेज्जपएसिए असंखेज्जपएसिए अगंतपएसिए खंधे जहेव अट्ठपदेसिए तहेव पत्तेयं भाणितव्वं / [786] संख्यातप्रदेशी, असंख्यातप्रदेशी और अनन्तप्रदेशी प्रत्येक स्कन्ध के विषय में, जैसे अष्टप्रदेशी स्कन्ध के सम्बन्ध में कहा, उसी प्रकार कहना चाहिए / Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org