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________________ दसवाँ घरमपद ] [ 17 3 नो चरिमाई 4 नो प्रचरिमाइं 5 नो प्रवत्तव्वयाई 6, प्तिय चरिमे य प्रचरिमे य| / 7 / सय चरिमेय प्रचरिमाइंच 10 8 सिय चरिमाइं च अचरिमे य 18181816 सिय चरिमाइं च प्रचरिमाईच|81 सिय चरिमेय प्रवत्तव्यए य सय चरिमे य अवत्तव्वए या 1 11 सिय चरिमे य प्रवत्तव्वयाई सय चरिमेय प्रवत्तव्वयाई 12 सिय चरिमाइं च प्रवत्तव्बए य 010 | 13 सिय चरिमाइं च प्रवत्तब्वयाई च नो प्रचरिमेय अवत्तव्वए य 15 नो प्रचरिमेय प्रवत्तव्ययाइंच 16 नो प्रचरिमाइंच प्रवत्तवए य 17 णो प्रचरिमाइं च अवत्तव्ययाइं च 18, सिय चरिमे य अचरिमे य प्रवत्तव्यए य 10 16 नो चरिमे य अचरिमे य प्रवत्तवयाइं च 20 नो चरिमे य अचरिमाइं च प्रवत्तव्वए य 21 नो चरिमे य अचरिमाइं च प्रवत्तव्ययाई च 22 सिय चरिमाइं च अचरिमे य अवत्तव्यए य |23 सिय चरिमाइं च प्रचरिमे य प्रवत्तव्वयाई च 101010|-' 24 सिय चरिमाइंच प्रचरिमाइंच प्रवत्तम्बए य 25 सिय चरिमाइंच प्रचरिमाइं च प्रवत्तम्बयाईच [786 प्र.] भगवन् ! षट्प्रदेशिक स्कन्ध के विषय में (मेरी पूर्ववत्) पृच्छा है, (उसका क्या समाधान है ?) [786 उ.] गौतम ! षट्प्रदेशिक स्कन्ध 1. कचित् चरम है, 2. अचरम नहीं है, 3. कथंचित् अवक्तव्य 000 है, (किन्तु) 4. न तो (वह) अनेक चरमरूप है, 5. न अनेक अचरमरूप है; 6. (और) न ही अनेक अवक्तव्यरूप है, (किन्तु) 7. कथंचित् चरम और अचरम | . Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003483
Book TitleAgam 15 Upang 04 Pragnapana Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorShyamacharya
AuthorMadhukarmuni, Gyanmuni, Shreechand Surana, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1983
Total Pages1524
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size37 MB
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