________________ mmm mmm 357 358 नौवाँ सम्यक्त्वद्वार दमवाँ ज्ञानद्वार ग्यारहवाँ दर्शनद्वार वारहवाँ संयतद्वार तेरहवाँ उपयोगद्वार चौदहवाँ अाहारदार पन्द्रहवाँ भापकद्वार सोलहवाँ पतिद्वार सत्तरहवाँ पर्याप्नद्वार अठारहवाँ मूक्ष्मद्वार उन्त्रीमवाँ संजीद्वार वोमवाँ भवमितिद्वार इक्कीसवाँ अस्तिकायद्वार बाईसवाँ चरमद्वार HG TAm' उन्नीसवाँ सम्यक्त्वपद Imm m प्राथमिक समुच्चय जीवों के विषय में दप्टि की प्ररूपणा चौवीस दंडकवत्ती जीवों और सिद्धों में सम्यक्त्वप्ररूपणा m वीसवाँ अन्तक्रियापद प्राथमिक अर्थाधिकार प्रथम-अन्तक्रियाद्वार द्वितीय-अनन्तरद्वार ततीय-एकममयदार चतुर्थ-उद्वत्तद्वार असुरकुमारादि की उत्पत्ति की प्ररूपणा पंचम तीर्थकरद्वार छठा चक्रिवार सातवा बलदेवत्वद्वार अष्टम वासुदेवत्वद्वार नवम माण्डलिकत्वहार दशम रत्नद्वार भव्य द्रव्यदेव-उपपात प्ररूपणा असजि-पायुप्यप्ररूपणा mmmmmmm7704 405 409 Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org