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________________ छठा व्युत्क्रान्तिपद ] [489 आयुष्यबन्ध करते हैं और कदाचित् आयु के तीसरे भाग के तीसरे भाग का तीसरा भाग शेष रहने पर परभव का आयुष्यबन्ध करते हैं / 680. आउ-तेउ-वाउ-वणप्फइकाइयाणं बेइंदिय-तेइंदिय-चरिदियाण वि एवं चेव / [680] अप्कायिक, तेजस्कायिक, वायकायिक और वनस्पतिकायिकों तथा द्वीन्द्रिय-त्रीन्द्रियचतुरिन्द्रियों (के पारभविक-आयुष्यबन्ध) का कथन भी इसी प्रकार (करना चाहिए)। 681. पंचेंदियतिरिक्खजोणिया णं भंते ! कतिभागावसेसाउया परभवियाउयं पकरेंति ? गोयमा! पंचेंदियतिरिक्खजोणिया विहा पन्नत्ता / तं जहा–संखेज्जवासाउया य प्रसंखेज्जवासाउया य / तत्थ णं जे ते असंखेज्जवासाउया ते नियमा छम्मासावसेसाउया परमवियाउयं पकरेंति / तत्थ णं जे ते संखेज्जवासाउया ते दुविहा पण्णता। तं जहा--सोवक्कमाउया य निरुवक्कमाउया य / तत्थ णं जे ते निरुवक्कमाउया ते णियमा तिभागावसेसाउया परभवियाउयं पकरेंति / तत्थ णं जे ते सोवक्कमाउया ते णं सिय तिभागे परभवियाउयं पकरेंति, सिय तिभागतिभागे य परभवियाउयं पकरेंति, सिय तिमागतिभागतिभागावसेसाउया परभवियाउयं पकरेंति / [681 प्र.] भगवन् ! पंचेन्द्रिय तिर्यञ्चयोनिक, आयुष्य का कितना भाग शेष रहने पर परभव की आयु का बन्ध करते हैं ? [681 उ.] गौतम ! पंचेन्द्रिय तिर्यञ्चयोनिक दो प्रकार के कहे गए हैं। वे इस प्रकार(१) संख्यातवर्षायुष्क और (2) असंख्यातवर्षायुष्क / उनमें से जो असंख्यात वर्ष की आयु वाले हैं, वे नियम से छह मास आय शेष रहते परभव का प्रायष्यबन्ध कर लेते हैं और जो इ. की आयु वाले हैं, वे दो प्रकार के कहे गए हैं। वे इस प्रकार हैं-(१) सोपक्रम अायु वाले और (2) निरुपक्रम आयु वाले। इनमें जो निरुपक्रम प्राय वाले हैं, वे नियमतः आयु का तीसरा भाग शेष रहने पर परभव का आयुष्यबन्ध करते हैं। जो सोपक्रम आयु वाले हैं, वे कदाचित् आयुष्य का तीसरा भाग शेष रहते पारभविक आयुष्यबन्ध करते हैं, कदाचित् आयु के तीसरे भाग का तीसरा भाग शेष रहते परभव का आयुष्यबन्ध करते हैं और कदाचित् आयु के तीसरे भाग के तीसरे भाग का तीसरा भाग शेष रहते पारभविक आयुबन्ध करते हैं। 682. एवं मणसा वि। [682] मनुष्यों का (पारभविक आयुष्यबन्ध-सम्बन्धी कथन भी) इसी प्रकार (करना चाहिए।) 683. वाणमंतर-जोइसिय-वेमाणिया जहा नेरइया / दारं 7 // [683] वाणव्यन्तर, ज्योतिष्क और वैमानिकों (के परभव का आयुष्यबन्ध) नैरयिकों के (पारभविक आयुष्यबन्ध के) समान (छह मास शेष रहने पर) कहना चाहिए। सप्तम पारभविकायुष्यद्वार // 7 // विवेचन-सप्तम पारभविकायुष्यद्वार : चातुर्गतिक जीवों को पारभविक प्रायुष्यबन्ध-सम्बन्धी तवर्ष Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003483
Book TitleAgam 15 Upang 04 Pragnapana Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorShyamacharya
AuthorMadhukarmuni, Gyanmuni, Shreechand Surana, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1983
Total Pages1524
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size37 MB
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