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________________ 488 ] [प्रज्ञापनासूत्र का उत्पाद गर्भज संख्यातवर्षायुष्क तिर्यञ्चपंचेन्द्रियों में होता है, असुरकुमारादि भवनपति, वाणव्यन्तर, ज्योतिष्क और सौधर्म तथा ईशान कल्प के वैमानिक देवों का उत्पाद बादर पर्याप्त पृथ्वीकायिक, अप्कायिक एवं वनस्पतिकायिकों में तथा गर्भज संख्यातवर्षायुष्क तिर्यञ्चपंचेन्द्रियों एवं मनुष्यों में होता है / पृथ्वीकायिक, अप्कायिक, वनस्पतिकायिक तथा द्वि-त्रि-चतुरिन्द्रिय जीवों का उत्पाद तिर्यञ्चगति और मनुष्यगति में तथा तेजस्कायिक-वायुकायिकों का केवल तिर्यञ्चगति में ही होता है / तिर्यञ्चपंचेन्द्रियों का उत्पाद नरक, तिर्यञ्च, मनुष्य एवं देवगति में, विशेषतः सहस्रारकल्पपर्यन्त वैमानिकों में होता है। मनुष्यों का उत्पाद चारों गतियों के सभी स्थानों में होता है तथा सनत्कुमार से लेकर सहस्रार देव पर्यन्त वैमानिक देवों का उत्पाद गर्भज संख्यातवर्षायुष्क तिर्यंचपंचेन्द्रियों एवं मनुष्यों में होता है, और पानत कल्प से लेकर सर्वार्थसिद्ध तक के देवों का उत्पाद गर्भज संख्यातवर्षायुष्क मनुष्यों में ही होता है।' सप्तम परभविकायुष्यद्वार : चातुर्गतिक जीवों की पारभविकायुष्यसम्बन्धी प्ररूपरणा 677. नेरइया णं भंते ! कतिभागावसेसाउया परभवियाउयं परिति ? गोयमा ! णियमा छम्मासावसेसाउया परभवियाउयं पकरेंति / [677 प्र.] भगवन् ! आयुष्य का कितना भाग शेष रहने पर नरयिक परभव (अागामी जन्म) को आयु (का बन्ध) करते हैं ? [677 उ.] गौतम ! (वे) नियम से छह मास प्रायु शेष रहने पर परभव की आयु बांधते हैं। 678. एवं असुरकुमारा वि जाव थणियकुमारा। __ [678] इसी प्रकार असुरकुमारों से लेकर स्तनितकुमारों तक (का परभविक-पायुष्यबन्ध सम्बन्धी कथन करना चाहिए / ) 676. पुढविकाइया णं भंते ! कतिमागावसेसाउया परभक्यिाउयं पकरेंति ? गोयमा! पुढविकाइया दुविहा पण्णत्ता। तं जहा- सोवक्कमाउया य निरुवक्कमाउया य / तत्थ णं जे ते निरुवक्कमाउया ते णियमा तिभागावसेसाउया परभवियाउयं पकरेंति / तत्थ णं जे ते सोवक्कमाउया ते सिय तिभागावसेसाउया परभवियाउयं पकरेंति, सिय तिभागतिभागावसे साउया परभवियाउयं पकरेंति, सिय तिभागतिभागतिभागावसेसाउया परभवियाउयं पकरेंति / __ [676 प्र.] भगवन् ! पृथ्वीकायिक जीव आयुष्य का कितना भाग शेष रहने पर परभव का आयुष्य बांधते हैं ? [679 उ.] गौतम ! पृथ्वीकायिक जीव दो प्रकार के कहे गए हैं, वे इस प्रकार-(१) सोपक्रम आयु वाले और (2) निरुपक्रम आयु वाले। इनमें से जो निरुपक्रम (उपक्रमरहित) आयु वाले हैं, वे नियम से आयुष्य का तीसरा भाग शेष रहने पर परभव की आयु का बन्ध करते हैं तथा इन में जो सोपक्रम (उपक्रमसहित) आयु वाले हैं, वे कदाचित् आयु का तीसरा भाग शेष रहने पर परभव का आयुष्यबन्ध करते हैं, कदाचित् प्रायु के तीसरे भाग का तीसरा भाग शेष रहने पर परभव का 1. प्रज्ञापनासूत्र मलय. वृत्ति, पत्रांक 216 Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003483
Book TitleAgam 15 Upang 04 Pragnapana Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorShyamacharya
AuthorMadhukarmuni, Gyanmuni, Shreechand Surana, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1983
Total Pages1524
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size37 MB
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