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________________ छठा व्युत्क्रान्तिपद ] [47 [673-2 प्र] भगवन् ! क्या (मनुष्य) नैयिक आदि सभी स्थानों में उत्पन्न होते हैं ? [673-2 उ.] गौतम! वे (इन) सभी स्थानों में उत्पन्न होते हैं, कहीं भी इनके उत्पन्न होने का निषेध नहीं करना चाहिए; यावत् सर्वार्थसिद्ध देवों तक में भी (मनुष्य) उत्पन्न होते हैं और कई मनुष्य सिद्ध होते हैं, बुद्ध (केवलबोधप्राप्त) होते हैं, मुक्त होते हैं, परिनिर्वाण प्राप्त को करते हैं और सर्वदुःखों का अन्त करते हैं / 674. वाणमंतर-जोइसिय-वेमाणिया सोहम्मीसाणा य जहा असुरकुमारा। नवरं जोइसियाणं वेमाणियाण य चयंतीति अभिलावो कातव्यो। [674} वाणव्यन्तर, ज्योतिष्क और सौधर्म एवं ईशान देवलोक के वैमानिक देवों की उद्वर्तन-प्ररूपणा असुरकुमारों के समान, समझनी चाहिए। विशेष यह है कि ज्योतिष्क और वैमानिक देवों के लिए ('उद्वर्त्तना करते हैं के बदले) 'च्यवन करते हैं', यों कहना चाहिए। 675. सणकुमारदेवाणं पुच्छा। गोयमा ! जहा असुरकुमारा / नवरं एगिदिएसु ण उववज्जति / एवं जाव सहस्सारगदेवा / [675 प्र.] भगवन् ! सनत्कुमार देव अनन्तर च्यवन करके कहाँ जाते हैं, कहाँ उत्पन्न होते हैं ? [675 उ.] इनकी (च्यवनानन्तर उत्पत्तिसम्बन्धी) वक्तव्यता असुरकुमारों के (उपपातसम्बन्धी वक्तव्य के) समान समझनी चाहिए / विशेष यह है कि (ये) एकेन्द्रियों में उत्पन्न नहीं होते / इसी प्रकार की वक्तव्यता सहस्रार देवों तक की कहनी चाहिए। 676. प्राणय जाव अणुत्तरोववाइया देवा एवं चेव / णवरं णो तिरिक्खजोणिएसु उववज्जति, मणूसेसु पज्जत्तगसंखेज्जवासाउयकम्मभूमगगम्भवक्कंतियमणूसेसु उववज्जंति / दारं 6 // 1676] आनत देवों से लेकर अनुत्तरौपपातिक देवों तक (च्यवनानन्तर उत्पत्ति-सम्बन्धी) वक्तव्यता इसी प्रकार समझनी चाहिए। विशेष यह है कि (ये देव) तिर्यञ्चयोनिकों में उत्पन्न नहीं होते, मनुष्यों में भी पर्याप्तक संख्यातवर्षायुष्क कर्मभूमिज गर्भज मनुष्यों में उत्पन्न होते हैं / -छठा उद्वर्तनाद्वार / / 6 / / विवेचन-छठा उद्वर्तनाद्वार : चातुर्गतिक जीवों के उद्वर्तनानन्तर गमन एवं उत्पाद की प्ररूपणा--प्रस्तुत ग्यारह सूत्रों (सू. 666 से 676 तक) में नैरयिकों से लेकर देवों तक के उद्वर्त्तनानन्तर गमन एवं उपपात के सम्बन्ध में सूक्ष्म ऊहापोहपूर्वक प्ररूपणा की गई है। उद्वर्तना की परिभाषा-नारकादि जीवों का अपने भव से निकलकर (मरकर या च्यवकर) सोये (बीच में कहीं अन्तर-व्यवधान न करके) किसी भी अन्य गति या योनि में जाना और उत्पन्न होना' उद्ववर्तना कहलाता है। निष्कर्ष-अपने भव से (मृत या च्युत होकर) निकले हुए नैरयिकों का सीधा (साक्षात्) उत्पाद गर्भज संख्यातवर्षायुष्क तिर्यक्पंचेन्द्रियों और मनुष्यों में होता है; सातवीं नरकपृथ्वी के नैरयिकों 1. प्रज्ञापना. प्रमेयबोधिनी टीका भा. 2, पृ 1109 Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003483
Book TitleAgam 15 Upang 04 Pragnapana Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorShyamacharya
AuthorMadhukarmuni, Gyanmuni, Shreechand Surana, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1983
Total Pages1524
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size37 MB
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