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________________ 490 [ प्रज्ञापनासूत्र प्ररूपणा तरकादि चारों गतियों के जीवों की आयु का कितना भाग शेष रहते परभवसंबंधी आयुष्य बन्ध होता है ? इस विषय में प्रस्तुत सात सूत्रों (सू. 677 से 683 तक) में प्ररूपणा की गई है। पारभविकायुष्यद्वार का तात्पर्य--वर्तमान भव में नारकादिपर्याय वाले जीव अपने वर्तमान भव सम्बन्धी आयु का कितना भाग शेष रहते अथवा आयुष्य का कितना भाग बीत जाने पर अगले जन्म (आगामी-परभव) की आयु का बन्ध करते हैं ? यही बताना इस द्वार का आशय है। सोपक्रम और निरुपक्रम की व्याख्या-~~जो आयु उपक्रमयुक्त हो, वह सोपक्रम कहलाती है और जो आयु उपक्रम से प्रभावित न हो सके, वह निरुपक्रम कहलाती है। आयु का विघात करने वाले तीव्र विष. शस्त्र. अग्नि. जल आदि उपक्रम कहलाते हैं। इन उपक्रमों के योग से दीर्घकाल में धीरे-धोरे भोगी जाने वाली प्राय बन्धकालीन स्थिति से पहले (शीघ्र ही भोग ली ज इन उपक्रमों के निमित्त से जो आयु बीच में ही टूट जाती है, जिस प्राय का भोगकाल बन्धकालीन स्थितिमर्यादा से कम हो, उसे अकालमृत्यु, सोपक्रम आयु अथवा अपवर्तनीय आयु भी कहते हैं / जो आयु बन्धकालीन स्थिति के पूर्ण होने से पहले न भोगी जा सके, अर्थात्-जिसका भोगकाल बन्धकालीन स्थितिमर्यादा के समान हो, वह निरुपक्रम या अनपवर्तनीय आयु कहलाती है / औपपातिक (नारक और देव), चरमशरीरी, उत्तमपुरुष और असंख्यातवर्षजीवी (मनुष्य-तिर्यञ्च), ये अनपवर्तनीय-निरुपक्रम आयु वाले होते हैं। निष्कर्ष-निरुपक्रमी जीवों में औपपातिक और असंख्यातवर्षजीवी अनपवर्तनीय आय वाले होते हैं / वे आयुष्य के 6 मास शेष रहते आगामी भव का आयुष्यबन्ध करते हैं, जैसे--नैरयिक, सब प्रकार के देव और असंख्यातवर्षजीवी मनुष्य-तिर्यञ्च / पृथ्वीकायिका दि से लेकर मनुष्यों तक दोनों ही प्रकार की आयु वाले होते हैं। इनमें जो निरुपक्रम आयु वाले होते हैं, वे आयु (स्थिति) के दो भाग व्यतीत हो जाने पर और तीसरा भाग शेष रहने पर आगामी भव का आयुष्य बांधते हैं, किन्तु जो सोपक्रम आयु वाले हैं, वे कदाचित् वर्तमान आयु का तीसरा भाग शेष रहने पर परभव की पायु का बन्ध करते हैं, किन्तु यह नियम नहीं है कि वे तीसरा भाग शेष रहते परभव का आयुष्यबन्ध कर ही लें। अतएव जो जीव उस समय प्रायुबन्ध नहीं करते, वे अवशिष्ट तीसरे भाग के तीन भागों में से दो भाग व्यतीत हो जाने पर और एक भाग शेष रहने पर आय का बन्ध करते हैं। कदाचित इस तीसरे भाग में भी पारभविक आयु का बन्ध न हुआ तो शेष आयु का तीसरा भाग शेष रहते आयु का बन्ध करते हैं / अर्थात् आयु के तीसरे भाग के तीसरे भाग के तीसरे भाग में आयुष्यबन्ध करते हैं / कोई-कोई विद्वान् इसका अर्थ यों करते हैं कि कभी आयु का नौवां भाग शेष रहने पर अथवा कभी प्रायु का सत्ताईसवां भाग शेष रहने पर सोपक्रम आयु वाले जीव आगामी भव का आयुष्य बांधते हैं। 1. (क) प्रज्ञापनासूत्र, प्रमेयबोधिनी टीका भा. 2, पृ. 1142-1143 (ख) तत्त्वार्थसूत्र (विवेचन, पं. सुखलालजी, नवसंस्करण) 'प्रोपपातिकचरमदेहोत्तमपुरुषाऽसंख्येयवर्षायुषोऽनपवायुषः / ' 2.25 -तत्त्वार्थसूत्र अ. 2, सू. 52 पर विवेचन / पृ. 79-80 (ग) श्री पन्नवणासूत्र के थोकड़े, प्रथम भाग, पृ. 150 (घ) 'कभी-कभी अपनी आयु के 27 वें भाग का तीसरा भाग यानी 81 वां भाग शेष रहने पर, कभी 81 वें भाग का तीसरा भाग यानी 243 वां भाग और कभी 243 3 भाग का तीसरा भाग यानी 729 वां भाग शेष रहने पर यावत् अन्तमुहूर्त शेष रहने पर परभव की आयु बांधते हैं।' -किन्हीं प्राचार्यों का मत - श्री पन्नवणासूत्र के थोकड़े, प्रथमभाग 1. 150, प्रज्ञापना प्र. बो. टीका भा. 2, पृ. 1144-45 Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003483
Book TitleAgam 15 Upang 04 Pragnapana Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorShyamacharya
AuthorMadhukarmuni, Gyanmuni, Shreechand Surana, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1983
Total Pages1524
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size37 MB
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