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________________ छठा व्युत्क्रान्तिपद ] [469 645.4 प्र.] भगवन् ! यदि कर्मभूमिज मनुष्यों स उत्पन्न होते हैं तो क्या संख्यातवर्षायुष्क कर्मभूमिज मनुष्यों से उत्पन्न होते हैं अथवा असंख्यातवर्षायुष्क कर्मभूमिज मनुष्यों से उत्पन्न होते हैं ? [645-4 उ.] गौतम ! (वे) संख्यातवर्षायुष्क कर्मभूमिज मनुष्यों से उत्पन्न होते हैं, (किन्तु) असंख्यातवर्षायुप्क कर्मभूमिज मनुष्यों से नहीं उत्पन्न होते / [5] जति संखेज्जवासाउएहितो उववज्जति किं पज्जत्तएहिंतो उववज्जति ? अपज्जत्तएहितो उववज्जंति? [645-5. प्र.] (भगवन्) ! यदि (तमःप्रभापृथ्वी के नैरयिक) संख्यातवर्षायुष्क कर्मभूमिज मनुष्यों से उत्पन्न होते हैं तो क्या पर्याप्तकों से उत्पन्न होते हैं अथवा अपर्याप्तकों से उत्पन्न होते हैं ? [645-5 उ.] गौतम ! पर्याप्तकों से उत्पन्न होते हैं, अपर्याप्तकों से उत्पन्न नहीं होते। [6] जति पज्जत्तयसंखेज्जवासाउयकम्मभूमएहितो उववज्जति कि इत्थीहितो उववज्जति ? पुरिसे हिंतो उववज्जति ? नपुंसएहितो उववज्जंति ? गोयमा ! इत्थोहितो वि उववजंति, पुरिसेहितो वि उववज्जति, नपुसएहितो वि उववज्जति। [645-6 प्र.] (भगवन् ! ) यदि वे पर्याप्तक संख्यातवर्षायुष्क कर्मभूमिज मनुष्यों से उत्पन्न होते हैं तो क्या स्त्रियों से उत्पन्न होते हैं ? या पुरुषों से उत्पन्न होते हैं ? अथवा नपुंसकों से उत्पन्न होते हैं ? [645-6 उ.] गौतम ! (वे) स्त्रियों से भी उत्पन्न होते हैं, पुरुषों से भी उत्पन्न होते हैं और नपुसकों से भी उत्पन्न होते हैं / 646. अधेसत्तमापुढविनेरइया गं भंते ! कतोहितो उववज्जति ? गोयमा! एवं चेव / नवरं इत्थोहितो [वि] पडिसेधो कातन्यो। [646 प्र.] भगवन् ! अधःसप्तमी (तमस्तमा) पृथ्वी के नैरयिक कहाँ से उत्पन्न होते हैं ? [646 उ.] गौतम ! इनकी उत्पत्ति-सम्बन्धी प्ररूपणा इसी प्रकार (छठी तमःप्रभापृथ्वी के नैरयिकों की उत्पत्ति के समान) समझनी चाहिए। विशेष यह है कि स्त्रियों से इनके उत्पन्न होने का निषेध करना चाहिए। 647. अस्सण्णी खलु पढम, दोच्चं च सिरीसिवा, तइयं पक्खी। सीहा जति चउत्थिं, उरगा पुण पंचमीपुढविं / / 183 / / छट्टि च इत्थियानो, मच्छा मणुया य सत्तमिं पुढविं। एसो परमुववाप्रो बोधयो नरयपुढवीणं // 184 // [647 संग्रहगाथार्थ-] असंज्ञी निश्चय ही पहली (नरकभूमि) में, सरीसृप (रेंग कर चलने वाले सर्प आदि) दूसरी (नरकपृथ्वी) तक, पक्षी तीसरी (नरकपृथ्वी) तक, सिंह चौथी (नरक For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org Jain Education International
SR No.003483
Book TitleAgam 15 Upang 04 Pragnapana Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorShyamacharya
AuthorMadhukarmuni, Gyanmuni, Shreechand Surana, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1983
Total Pages1524
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size37 MB
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