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________________ 442] [प्रज्ञापनासूत्र (मनुष्यों में चरमशरीरी एवं उत्तमपुरुष को छोड़कर) सोपक्रम एवं निरुपक्रम, दोनों ही प्रकार का आयुर्बन्ध करते हैं। निरुपक्रमी जीव आयु का तृतीय भाग शेष रहते और सोपक्रमी वर्तमान आयु का विभाग, अथवा विभाग का त्रिभाग या विभाग के विभाग का त्रिभाग शेष रहते आगामी भव का आयुष्य बांधते हैं / इस प्रकार परभविक आयुष्यबन्ध की प्ररूपणा की गई है। * अष्टमद्वार में जातिनामनिधत्तायु गतिनामनिधत्तायु, स्थितिनामनिधत्तायु, अवगाहनानाम निधत्तायु, प्रदेशनामनिधत्ताय और अनुभाव-नामनिधत्ताय, यों आयबन्ध के 6 प्रकार बताकर यह स्पष्ट किया गया है कि जातिनामादि विशिष्ट अायुबन्ध कौन जीव कितने-कितने आकर्ष से करता है ? जातिनामनिधत्तायु आदि से युक्त आयुबन्ध सामान्य जीव तथा नैरयिकादि वैमानिकपर्यन्त जीव जघन्य एक, दो, तीन अथवा उत्कृष्ट आठ आकर्षों से करते हैं, यह प्ररूपणा की गई है / अन्त में, एक से पाठ आकर्षों से प्रायुबन्ध करने वालों के अल्पबहुत्व की चर्चा की गई है। 1. (क) पण्णवणासुत्त भा. 2, छठे पद की प्रस्तावना-पृ. 67 से 74 तक (ख) प्रज्ञापनासूत्र मलय. वृत्ति, पत्रांक 205 (ग) प्रज्ञापना. प्रमेयबोधिनी टोका भा. 2, पृ. 929 से 931 तक Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003483
Book TitleAgam 15 Upang 04 Pragnapana Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorShyamacharya
AuthorMadhukarmuni, Gyanmuni, Shreechand Surana, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1983
Total Pages1524
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size37 MB
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