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________________ 12] [ प्रज्ञापनासूत्र कर्मेन्धन को जाज्वल्यमान शुक्लध्यानाग्नि से घ्मात यानी दग्ध (भस्म) कर डाला है, वे सिद्ध हैं। अथवा जो सिद्ध -निष्ठितार्थ (कृतकृत्य) हो चुके हैं, वे सिद्ध हैं। या "षिध्' धातु शास्त्र और मांगल्य अर्थ में होने से इसके दो अर्थ और निकलते हैं--(१) जो शास्ता हो चुके हैं, अथवा (2) मंगलरूपता का अनुभव कर चुके हैं वे सिद्ध हैं। जिणरिदं जो रागादि शत्रुओं को जीतते हैं, वे जिन हैं / वे चार प्रकार के हैं.-श्रुतजिन, अवधिजिन, मनःपर्यायजिन और केवलिजिन / यहाँ केवलिजिन को सूचित करने के लिए 'वर' शब्द प्रयुक्त किया गया है। जिनों में जो वर यानी श्रेष्ठ हो तथा अतीत-अनागत-वर्तमानकाल के समस्त पदार्थों के स्वरूप को जानने वाले केवलज्ञान से युक्त हो, वह जिनवर कहलाता है। परन्तु ऐसा जिनवर तो सामान्यकेवली भी होता है, अतः तीर्थकरत्वसूचक पद बतलाने के लिए जिनवर के साथ 'इन्द्र' विशेषण लगाया है, जिसका अर्थ होता है-'जिनवरों के इन्द्र'। यहां ऋषभदेव आदि अन्य तीर्थंकरों को वन्दन न करके तीर्थकर महावोर को ही वन्दन किया गया है, इसका कारण है-महावीर वर्तमान जिनशासन (धर्मतीर्थ) के अधिपति होने से प्रसन्न उपकारी हैं / महावीरं-जो महान् वीर हो, वह महावीर है। प्राध्यात्मिक क्षेत्र में वीर का अर्थ है--जो कषायादि शत्रुओं के प्रति वीरत्व =पराक्रम दिखलाता है। महावीर का 'महावीर' यह नाम परीषहों और उपसर्गों को जीतने में महावीर द्वारा प्रकट की गई असाधारण वीरता की अपेक्षा से सुरों और असुरों द्वारा दिया गया है। तेलोक्कगुरु-भगवान् महावीर का यह विशेषण है-तीनों लोकों के गुरु। गुरु उसे कहते हैं, जो यथार्थरूप से प्रवचन के अर्थ का प्रतिपादन करता है। भगवान् महावीर तीनों लोकों के गुरु इसलिए थे कि उन्होंने अधोलोकनिवासी असुरकुमार आदि भवनपति देवों को, मध्यलोकवासी मनुष्यों, पशुओं, विद्याधरों, वाणव्यन्तर एवं ज्योतिष्कदेवों को, तथा ऊर्ध्वलोकवासी सौधर्म आदि वैमानिक देवों, इन्द्रों आदि को धर्मोपदेश दिया। भगवान् महावीर के लिए प्रयुक्त 'जिनवरेन्द्र' 'महावीर' और 'त्रैलोक्यगुरु' ये तीनों शब्द क्रमशः उनके ज्ञानातिशय, पूजातिशय, अपायापगमातिशय एवं वचनातिशय को प्रकट करते हैं / जिणवरेणं भगवया सामान्य केवली भी जिन कहलाते हैं किन्तु इसके 'वर' शब्द जोड़ने से सामान्य केवलियों से भी वर-उत्तम तीर्थकर सूचित हो सकते हैं, किन्तु छद्मस्थ-क्षीणमोहजिन की अपेक्षा से सामान्यकेवली भी 'जिनवर' कहला सकते हैं, अतः तीर्थकर अर्थ द्योतित करने हेतु 'भगवया' विशेषण लगाया गया। भगवान महावीर में समग्र ऐश्वर्य (अष्ट महाप्रातिहार्य, त्रैलोक्याधिपतित्व ग्रादि), धर्म, यश, श्री, वैराग्य एवं प्रयत्न ये 6 भगवत्तत्व थे, इसलिए यहाँ 'तीर्थंकर भगवान् महावीर ने' यही अर्थ स्पष्टतः सूचित होता है। सितं-बद्धमष्टप्रकारं कर्मन्धनं, मातं-दग्ध जाज्वल्यमानशुक्लध्यानानलेन यस्ते सिद्धाः। यदि वा 'षिध संराद्धौ'-सिध्यन्तिस्म निष्ठितार्था भवन्तिस्म; यद्वा 'षिध शास्त्रे मांगल्ये च'-सेधन्तेस्म-शासितारोऽभवन, मांगल्यरूपतां वाऽनुभवन्तिस्मेति सिद्धाः / / "ध्मातं सितं येन पुराणकर्म , यो वा गतो निर्वृतिसौधमूनि / ख्यातोऽनुशास्ता परिनिष्ठितार्थो, यः सोऽस्तु सिद्धः कृतमंगलो मे // -प्रज्ञापना. म. वृत्ति, पत्रांक 2-3 2. अयले भयभेरवाणं खंतिखमे परीसहोवसगाणं / देवेहि कए महावीर' इति / 3. ऐश्वर्यस्थ समग्रस्य धर्मस्य यशसः श्रियः / वैराग्यस्याथ प्रयत्नस्य षण्णां भग इतीङ्गना। ----प्रज्ञापना. म. वृत्ति, पत्रांक 3-4 Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003483
Book TitleAgam 15 Upang 04 Pragnapana Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorShyamacharya
AuthorMadhukarmuni, Gyanmuni, Shreechand Surana, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1983
Total Pages1524
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size37 MB
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