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________________ पांचवां विशेषपद (पर्यायपद) ] [401 मनुष्य से द्रव्य की अपेक्षा से तुल्य है, प्रदेशों की अपेक्षा से भी तुल्य है, अवगाहना की दृष्टि से चतुःस्थानपतित है, स्थिति की अपेक्षा से चतु:स्थानपतित है, तथा वर्ण, गन्ध, रस और स्पर्श के पर्यायों की अपेक्षा से षट्स्थानपतित है, तथा आभिनिबोधिक ज्ञान के पर्यायों की अपेक्षा से तुल्य है. किन्तु श्रुतज्ञान के पर्यायों की अपेक्षा से और दो दर्शनों की अपेक्षा से षट्स्थानपतित है। [2] एवं उक्कोसाभिणिबोहियणाणी वि। नवरं आभिणिवोहियणाणपज्जवेहि तुल्ले, ठितीए तिवाणवडिते, तिहि णाहि तिहि सणेहि छट्ठाणवडिते / [493-2] इसी प्रकार उत्कृष्ट प्राभिनिबोधिकज्ञानी (मनुष्यों की पर्यायों के विषय में जानना चाहिए।) विशेष यह है कि वह आभिनिबोधिकज्ञान के पर्यायों की अपेक्षा से तुल्य है, स्थिति की अपेक्षा से त्रिस्थानपतित है, तथा तीन ज्ञानों और तीन दर्शनों की अपेक्षा से षट्स्थानपतित है / [3] अजहण्णमणुक्कोसाभिणिबोहियणाणी जहा उक्कोसाभिणिबोहियणाणी / णवरं ठितीए चउट्ठाणवडिते, सट्ठाणे छट्ठाणवडिते / [463-3] अजघन्य-अनुत्कृष्ट (मध्यम) प्राभिनिबोधिकज्ञानी मनुष्यों के पर्यायों के विषय में उत्कृष्ट आभिनिबोधिकज्ञानी मनुष्यों की तरह हो कहना चाहिए। विशेष यह है कि स्थिति की अपेक्षा से चतु:स्थानपतित हैं, तथा स्वस्थान में षट्स्थानपतित हैं / 464. एवं सुतणाणी वि। [464] इसी प्रकार (जघन्य-उत्कृष्ट-मध्यम) श्रुतज्ञानी (मनुष्यों) के (पर्यायों के) विषय में (सारा पाठ कहना चाहिए / ) 465. [1] जहण्णोहिणाणीणं भंते ! मणुस्साणं केवतिया पज्जवा पण्णता ? गोयमा ! प्रणता पज्जवा पण्णत्ता। से केणद्वेणं भंते ! एवं वुच्चति ? गोयमा ! जहण्णोहिणाणी मणुस्से जहण्णोहिणाणिस्स मणूसस्स दवट्ठयाए तुल्ले, पएसट्ठयाए तुल्ले, प्रोगाहणट्ठयाए चउट्ठाणवडिते, ठिईए तिट्ठाणवडिते, वण्ण-गंध-रस-फासपज्जवेहि दोहि नाणेहि छट्ठाणवडिए, प्रोहिणाणपज्जवेहि तुल्ले, मणपज्जवणाणपज्जवेहि छट्ठाणवडिए, तिहि सणेहि छट्ठाणवडिए। [465-1 प्र.] भगवन् ! जघन्य अवधिज्ञानी मनुष्यों के कितने पर्याय कहे गए हैं ? [465-1 उ.] गौतम ! उनके अनन्त पर्याय कहे हैं। [प्र.] भगवन् ! किस कारण से ऐसा कहते हैं (कि जघन्य अवधिज्ञानी मनुष्यों के अनन्तपर्याय हैं) ? [उ.] गौतम ! एक जघन्य अवधिज्ञानी मनुष्य, दूसरे जघन्य अवधिज्ञानी मनुष्य से द्रव्य की अपेक्षा से तुल्य है, प्रदेशों की अपेक्षा से (भी) तुल्य है, अवगाहना की अपेक्षा से चतु:स्थानपतित (पाठान्तर की दृष्टि से 'त्रिस्थानपतित') है, स्थिति की अपेक्षा से त्रिस्थानपतित है, तथा वर्ण, गन्ध, Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003483
Book TitleAgam 15 Upang 04 Pragnapana Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorShyamacharya
AuthorMadhukarmuni, Gyanmuni, Shreechand Surana, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1983
Total Pages1524
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size37 MB
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