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________________ 384] [प्रज्ञापनासूत्र [2] एवं उक्कोसठितीए वि। [467-2] इसी प्रकार उत्कृष्ट स्थिति वाले (पृथ्वीकायिक जीवों के पर्यायों के विषय में भी समझ लेना चाहिए।) [3] अजहण्णमणुक्कोसठितीए वि एवं चेव / गवरं सट्टाणे तिढाणवडिते। [467-3] अजघन्य-अनुत्कृष्ट स्थिति वाले पृथ्वीकायिक जीवों के पर्यायों के विषय में इसी प्रकार कहना चाहिए / विशेष यह है कि वे स्वस्थान में त्रिस्थानपतित हैं। 468. [1] जहण्णगुणकालयाणं भंते ! पुढविकाइयाणं पुच्छा। गोयमा ! अणंता पज्जवा पण्णत्ता। से केणद्वेणं भंते ! एवं वुच्चति जहण्णगुणकालयाणं पुढविकाइयाणं अणंता पज्जवा पण्णता? गोयमा ! जहण्णगुणकालए पुढविकाइए जहण्णगुणकालगस्स पुढविकाइयस्स दवट्ठयाए तुल्ले, पदेसट्टयाए तुल्ले, प्रोगाहणट्टयाए चउट्ठाणवडिते, ठितीए तिट्ठाणवडिते, कालवण्णपज्जवेहि तुल्ले, अवसेसेहि वण्ण-गंध-रस-फासपज्जवेहि छट्ठाणवडिते, दोहि अण्णाणेहि प्रचक्खुदंसणपज्जवेहि य छट्ठाणवड़िते। [468-1 प्र.] भगवन् ! जघन्यगुण काले पृथ्वीकायिक जीवों (के पर्यायों के परिमाण) की पृच्छा है ! [468-1 उ.] गौतम ! उनके अनन्त पर्याय कहे गए हैं / [प्र.] भगवन् ! किस कारण से ऐसा कहा जाता है कि 'जघन्य गुण काले पृथ्विीकायिक जीवों के अनन्त पर्याय कहे हैं ?' [उ.] गौतम ! जघन्य गुण काला एक पृथ्वीकायिक, दूसरे जघन्य गुण काले पृथ्वीकायिक से द्रव्य की अपेक्षा से तुल्य है, प्रदेशों की अपेक्षा से तुल्य है; (किन्तु) अवगाहना की दृष्टि से चतुःस्थानपतित है, स्थिति की अपेक्षा से त्रिस्थानपतित है; काले वर्ण के पर्यायों की अपेक्षा से तुल्य है; तथा अवशिष्ट वर्ण, गन्ध, रस, और स्पर्श के पर्यायों की अपेक्षा से षट्स्थानपतित है; एवं दो अज्ञानों और अचक्षुदर्शन के पर्यायों से भी षट्स्थानपतित (हीनाधिक) है। [2] एवं उक्कोसगुणकालए धि / [468-2] इसी प्रकार उत्कृष्टगुण काले पृथ्वीकायिक जीवों के (पर्यायों के विषय में कथन करना चाहिए।) [3] प्रजहण्णमणुक्कोसगुणकालए वि एवं चेव / णवरं सट्ठाणे छट्ठाणडिते। [468-3] मध्यम (अजघन्य-अनुत्कृष्ट) गुण काले पृथ्वीकायिक जीवों के पर्यायों के विषय में भी इसी प्रकार कहना चाहिए / विशेष यह है कि वह स्वस्थान में षट्स्थानपतित है। " 466. एवं पंच वण्णा दो गंधा पंच रसा अढ फासा भाणितव्वा। [466] इसी प्रकार (पृथक्-पृथक् जघन्य-मध्यम-उत्कृष्टगुण वाले) पांच वर्णों, दो गन्धों, Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003483
Book TitleAgam 15 Upang 04 Pragnapana Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorShyamacharya
AuthorMadhukarmuni, Gyanmuni, Shreechand Surana, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1983
Total Pages1524
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size37 MB
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