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________________ पांचवां विशेषपद (पर्यायपद)] [383 [466-1 प्र. भगवन् ! जघन्य अवगाहना वाले पृथ्वीकायिक जीवों के कितने पर्याय प्ररूपित किये गए है ? [466-1 उ. गौतम ! (उनके) अनन्त पर्याय प्ररूपित किये गए हैं। [प्र. भगवन् ! किस कारण से ऐसा कहा जाता है कि जघन्य अवगाहना वाले पृथ्वीकायिक जीवों के अनन्तपर्याय हैं ? [उ.] गौतम ! जघन्य अवगाहना वाला एक पृथ्वीकायिक, दूसरे जघन्य अवगाहना वाले पृथ्वीकायिक से द्रव्य की अपेक्षा से तुल्य है, प्रदेशों की अपेक्षा से तुल्य है, अवगाहना की अपेक्षा से तुल्य है, किन्तु स्थिति की अपेक्षा से त्रिस्थानपतित (हीनाधिक) है, तथा वर्ण, गन्ध, रस और स्पर्श के पर्यायों की अपेक्षा से, दो अज्ञानों की अपेक्षा से एवं अचक्षुदर्शन के पर्यायों की दृष्टि से षट्स्थानपतित है। [2] एवं उक्कोसोगाहणए वि। [466-2] इसी प्रकार उत्कृष्ट अवगाहना वाले पृथ्वीकायिक जीवों के पर्यायों का कथन भी करना चाहिए। [3] अजहण्णमणुक्कोसोगाहणए वि एवं चेव / नवरं सटाणे च उढाणवड़िते। [466-3] अजघन्य-अनुत्कृष्ट (मध्यम) अवगाहना वाले पृथ्वीकायिक जीवों के पर्यायों के विषय में भी ऐसा ही समझना चाहिए / विशेष यह है कि मध्यम अवगाहना वाले पृथ्वोकायिक जीव स्वस्थान में अर्थात् अवगाहना की अपेक्षा से भी चतु:स्थानपतित (हीनाधिक) हैं। 467. [1] जहण्णद्वितीयाणं भंते ! पुढविकाइयाणं पुच्छा। गोयमा ! अणंता पज्जवा पण्णत्ता। से केणठेणं भंते ! एवं कुच्चति जहण्णद्वितीयाणं पुढविकाइयाणं प्रणता पज्जवा पण्णता ? गोयमा ! जहण्णठितीए पुढविकाइए जहण्णठितीयस्स पुढविकाइयस्स दवट्ठयाए तुल्ले, पदेसट्टयाए तुल्ले, प्रोगाहणटुताए चउट्ठाणवडिते, ठितीए तुल्ले, वण्ण-गंध-रस-फासपज्जवेहि मतिअण्णाण-सुतप्रणाण-प्रचक्खुदंसणपज्जवेहि य छट्ठाणवड़िते / [467-1 प्र.] भगवन् ! जघन्य स्थिति वाले पृथ्वीकायिक जीवों के पर्याय कितने कहे गए हैं? [467-1 उ.] गौतम ! (उनके) अनन्तपर्याय कहे गए हैं / [प्र.] भगवन ! किस कारण से ऐसा कहा जाता है कि 'जघन्य स्थिति वाले पृथ्वीकायिक जीवों के अनन्त पर्याय कहे हैं ?' [उ.] गौतम ! एक जघन्य स्थिति वाला पृथ्वीकायिक, दूसरे जघन्य स्थिति वाले पृथ्वीकायिक से द्रव्य की अपेक्षा से तुल्य है, प्रदेशों की अपेक्षा से तुल्य है, अवगाहना की दृष्टि से चतुःस्थानपतित (हीनाधिक) है, स्थिति की अपेक्षा से तुल्य है, तथा वर्ण, गन्ध, रस और स्पर्श के पर्यायों, मति-अज्ञान, श्रुत-अज्ञान और अचक्षु-दर्शन के पर्यायों की अपेक्षा से षट्स्थानपतित है। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003483
Book TitleAgam 15 Upang 04 Pragnapana Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorShyamacharya
AuthorMadhukarmuni, Gyanmuni, Shreechand Surana, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1983
Total Pages1524
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size37 MB
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