________________ चतुर्थ स्थितिपद [ 353 विवेचन-वैमानिक देवगणों की स्थिति का निरूपण-प्रस्तुत इकतीस सूत्रों (सू. 307 से 337 तक) में वैमानिक देवों के निम्नोक्त प्रकार से स्थिति का निरूपण किया गया है-(१) वैमानिक देवों (औधिक, अपर्याप्त एवं पर्याप्त) की, (2) वैमानिक देवियों (औधिक, अपर्याप्त एवं पर्याप्त) को (3) तथा सौधर्मकल्प से लेकर अच्युतकल्प तक के देवों (औधिक, अपर्याप्तक एवं पर्याप्तक) की तथा सौधर्म एवं ईशान कल्प की देवियों (ौधिक, अपर्याप्तक, पर्याप्तक, परिगृहीता, अपरिगृहीता) की और (4) नौ सूत्रों में नौ प्रकार के अवेयकों (औधिक, अपर्याप्त एवं पर्याप्त) को तथा (5) विजय, वैजयन्त, जयन्त एवं अपराजित देवों एवं सर्वार्थसिद्ध देवों (प्रोधिक, अपर्याप्तक एवं पर्याप्तक) की स्थिति / // प्रज्ञापनासूत्र : चतुर्थ स्थितिपद समाप्त // Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org