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________________ 308] [ प्रज्ञापनासूत्र 355. [1] सुहुमपुढविकाइयाणं पुच्छा। गोयमा ! जहण्णेण वि उपकोण वि अंतोमहत्तं / / [355-1 प्र.] भगवन् ! सूक्ष्म पृथ्वीकायिक जीवों की कितने काल तक की स्थिति कही [355-1 उ.] गौतम ! जघन्य भी और उत्कृष्ट भी अन्तर्मुहूर्त की है। [2] अपज्जत्तयसुहुमपुढविकाइयाणं पुच्छा।। गोयमा ! जहण्णण वि उक्कोसेण वि अंतोमुहत्तं / [355-2 प्र.] भगवन् ! अपर्याप्तक सूक्ष्म पृथ्वीकायिक जीवों की स्थिति कितने काल की कही गई है ? [355-2 उ.] गौतम ! जघन्य भी और उत्कृष्ट भी अन्तर्मुहूर्त की है / [3] पज्जत्तयसुहमपुढविकाइयाणं पुच्छा / गोयमा ! जहण्णेण वि उक्कोसेण वि अंतोमुहत्तं / [355-3 प्र.] भगवन् ! पर्याप्त सूक्ष्म पृथ्वीकायिक जीवों की स्थिति कितने काल की कही गई है ? [355-3 उ.] गौतम ! जघन्य भी और उत्कृष्ट भी अन्तर्मुहूर्त की है। 356. [1] बादरपुढविकाइयाणं पुच्छा। गोयमा ! जहष्णेणं अंतोमुहुत्तं, उक्कोसेणं बावीसं वाससहस्साई। [656-1 प्र.] भगवन् ! बादर पृथ्वीकायिक जीवों की स्थिति कितने काल तक की कही गई है ? 356-1 उ.] गौतम ! (उनकी स्थिति) जघन्य अन्तर्मुहूर्त की और उत्कृष्ट बाईस हजार वर्ष की है। [2] अपज्जत्तयबावरपुढविकाइयाणं पुच्छा। गोयमा ! जहण्णेण वि उक्कोसेण वि अंतोमहत्तं / [356-2 प्र.] भगवन् ! बादर पृथ्वीकायिक अपर्याप्तक जीवों की स्थिति कितने काल की कही गई है ? [356-2 उ.] गौतम ! जघन्य भी और उत्कृष्ट भी अन्तर्मुहूर्त की है। [3] पज्जत्तयबादरपुढविकाइयाणं पुच्छा। गोयमा ! जहण्णणं अंतोमुहत्तं, उक्कोसेणं बावीसं वाससहस्साई अंतोमुत्तूणाई। [356-3 प्र.] भगवन् ! पर्याप्तक बादर पृथ्वीकायिक जीवों की स्थिति कितने काल की कही गई है ? Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003483
Book TitleAgam 15 Upang 04 Pragnapana Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorShyamacharya
AuthorMadhukarmuni, Gyanmuni, Shreechand Surana, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1983
Total Pages1524
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size37 MB
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