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________________ तृतीय बहुबक्तव्यतापद] [289 (उनसे) बादरनिगोद-अपर्याप्तक असंख्यातगुणे हैं, 61. बादर पृथ्वीकायिक-अपर्याप्तक (उनसे) असंख्यातगुणे हैं, 62. बादर-अप्कायिक-अपर्याप्तक (उनसे) असंख्यातगुणे हैं, 63. (उनकी अपेक्षा) बादर-वायुकायिक-अपर्याप्तक असंख्यातगुणे हैं, 64. (उनकी अपेक्षा) सूक्ष्म तेजस्कायिक-अपर्याप्तक असंख्यातगुणे हैं, 65. (उनकी अपेक्षा) सूक्ष्म पृथ्वीकायिक-अपर्याप्तक विशेषाधिक हैं, 66. (उनकीअपेक्षा) सूक्ष्म अप्कयिक-अपर्याप्तक विशेषाधिक हैं.६७. (उनसे) सक्षम वायका , अपर्याप्तक विशेषाधिक हैं, 68. (उनकी अपेक्षा) सूक्ष्म तेजस्कायिक-पर्याप्तक संख्यातगुणे हैं, 69. (उनकीअपेक्षा) सूक्ष्म पृथ्वीकायिक-पर्याप्तक विशेषाधिक हैं, 70. (उनसे) सूक्ष्म अप्कायिक-पर्याप्तक विशेषाधिक हैं, 71. (उनकी अपेक्षा) सूक्ष्म वायुकायिक-पर्याप्तक विशेषाधिक हैं, 72. (उनसे) सूक्ष्म निगोद-अपर्याप्तक असंख्यातगुणे हैं, 73. (उनसे) सूक्ष्म निगोद-पर्याप्तक संख्यातगुणे हैं, 74. (उनकी अपेक्षा) अभवसिद्धिक (अभव्य) अनन्तगुण हैं, 75. (उनसे) सम्यक्त्व से भ्रष्ट (प्रतिपतित) अनन्तगुणे हैं, 76. (उनकी अपेक्षा) सिद्ध अनन्तगुणे हैं, 77. (उनकी अपेक्षा) बादर वनस्पतिकायिकपर्याप्तक अनन्तगुणे हैं, 75. (उनसे) बादरपर्याप्तक विशेषाधिक हैं, 76. (उनकी अपेक्षा) बादर वनस्पतिकायिक-अपर्याप्तक असंख्यातगुणे हैं, 80. (उनकी अपेक्षा) बादर-अपर्याप्तक विशेषाधिक हैं, 81. (उनसे) बादर विशेषाधिक हैं, 82. (उनसे) सूक्ष्म वनस्पतिकायिक-अपर्याप्तक असंख्यातगुणे हैं, 83. (उनकी अपेक्षा) सूक्ष्म-अपर्याप्तक विशेषाधिक हैं, 84. (उनसे) सूक्ष्म वनस्पतिकायिक पर्याप्तक संख्यातगुणे हैं, 85. (उनसे) सूक्ष्म-पर्याप्तक विशेषाधिक हैं, 86. (उनकी अपेक्षा) सूक्ष्म विशेषाधिक हैं, 87. (उनसे) भवसिद्धिक (भव्य विशेषाधिक हैं. 9. (उनकी अपेक्षा) निगोद के जीव विशेषाधिक हैं, 89. (उनसे) वनस्पति जीव विशेषाधिक हैं, 90. (उनसे) एकेन्द्रिय जीव विशेषाधिक हैं, 61. (उनसे) तिर्यञ्चयोनिक विशेषाधिक हैं, 62. (उनसे) मिथ्यादृष्टि-जीव विशेषाधिक हैं, 63. (उनसे) अविरत जीव विशेषाधिक हैं, 64. (उनकी अपेक्षा) सकषायी जीव विशेषाधिक हैं, 95. (उनसे) छद्मस्थ जीव विशेषाधिक हैं, 96. (उनकी अपेक्षा) सयोगी जीव विशेषाधिक हैं, 97. (उनकी अपेक्षा) संसारस्थ जीव विशेषाधिक हैं, 18. (उनकी अपेक्षा) सर्वजीव विशेषाधिक हैं। सत्ताईसवाँ (महादण्डक) द्वार / / 27 / / विवेचन–सत्ताईसवाँ महादण्डकद्वार : सर्व जीवों के अल्पबहुत्व का विविध विवक्षाओं से निरूपण-प्रस्तुत सूत्र (334) में महादण्डकद्वार के निमित्त से विविध विवक्षाओं से समस्त जीवों के अल्पबहुत्व का प्रतिपादन किया गया है / ___ महादण्डक के वर्णन की अनुज्ञा-शिष्य को गुरु की अनुज्ञा लेकर ही शास्त्र प्ररूपणा या व्याख्या करनी चाहिए। इस दृष्टि से श्री गौतमस्वामी महादण्डक का वर्णन करने की अनुमति लेकर कहते हैं कि-भगवन् ! मैं जीवों के अल्पबहुत्व के प्रतिपादक महादण्डक का वर्णन करता हूँ अथवा रचना करता हूँ। समस्त जीवों के अल्पबहुत्व का क्रम-(१) गर्भज जीव सबसे कम इसलिए हैं कि उनकी संख्या संख्यात-कोटाकोटि परिमित है। (2) उनकी अपेक्षा मनुष्य स्त्रियाँ संख्यातगुणी अधिक हैं, क्योंकि मनुष्यपुरुषों की अपेक्षा सत्ताईसगुणी और सत्ताईस अधिक होती हैं / (3) उनसे बादर 1. प्रज्ञापनासूत्र मलय. वृत्ति, पत्रांक 163 2. 'सत्तावीसगुणा पुण मणुयाणं तदहिआ चेव' -प्रज्ञापना. म. वृत्ति, पत्रांक 163 में उद्धत Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003483
Book TitleAgam 15 Upang 04 Pragnapana Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorShyamacharya
AuthorMadhukarmuni, Gyanmuni, Shreechand Surana, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1983
Total Pages1524
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size37 MB
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