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________________ 286] [प्रज्ञापनासूत्र अपेक्षा त्रिप्रदेशावगाढ़ पुद्गल द्रव्य, इसी प्रकार चारप्रदेशावगाढ़, पंचप्रदेशावगाढ़, यावत् संख्यातप्रदेशावगाढ़ पुद्गलद्रव्य द्रव्य की विवक्षा से उत्तरोत्तर संख्यातगुणे अधिक हैं। उनकी अपेक्षा असंख्यातप्रदेशावगाढ़ पुद्गल द्रव्यविवक्षा से असंख्यातगुणे हैं, क्योंकि असंख्यात के असंख्यात भेद कहे गए हैं / इसी प्रकार द्रव्यार्थतासूत्र, प्रदेशार्थतासूत्र एवं द्रव्यप्रदेशार्थता सूत्र सुगम होने से सर्वत्र घटित कर लेना चाहिए। ___ काल एवं भाव की दृष्टि से पुद्गलों का अल्पबहुत्व-काल की अपेक्षा से-एक समय की स्थिति से लेकर अनन्तसमयों तक की स्थिति वाले पुद्गलों का अल्पबहुत्व भी यथायोग्य समझ लेना चाहिए / भाव की अपेक्षा से--काले प्रादि 5 वर्ण, दो गन्ध, तिक्त, कटु आदि पांच रस और शीत, उष्ण स्निग्ध और रूक्ष इन बोलों का अल्पबहुत्व मूलपाठ में कथित काले वर्ण के समान समझ लेना चाहिए / एकगुण काले पुद्गलों के अल्पबहुत्व की वक्तव्यता सामान्य पुद्गलों की तरह कहनी चाहिए। यथा---१. सबसे कम अनन्तप्रदेशी स्कन्ध एकगण काले हैं, 2. द्रव्य की अपेक्षा से परमाणपुद्गल एकगुण काले अनन्तगुणे हैं, (उनसे) संख्यातप्रदेशी स्कन्ध एकगुण काले संख्यातगुणे हैं, उनसे असंख्यातप्रदेशी स्कन्ध एकगुण काले असंख्यातगुणे हैं / इसी प्रकार प्रदेश को अपेक्षा से समझना चाहिए / कर्कश, मृदु, गुरु और लघु स्पर्श का प्रत्येक का अल्पबहुत्व एकप्रदेश-अवगाढ के समान समझना चाहिए / यथा-एकप्रदेशावगाढ़ एकगुण कर्कशस्पर्श द्रव्यार्थरूप से सबसे कम हैं, उनसे संख्यातप्रदेशावगाढ़ एकगुण कर्कशस्पर्श पुद्गल द्रव्यार्थरूप से संख्यातगुणे हैं, उनसे असंख्यातप्रदेशावगाढ़ एकगुण कर्कशस्पर्श द्रव्यार्थरूप से असंख्यातगुणे हैं, इत्यादि / इसी प्रकार संख्यातगुण कर्कशस्पर्श असंख्यातगुण कर्कशस्पर्श एवं अनन्तगुण कर्कशस्पर्श के अल्पबहुत्व के विषय में समझ लेना चाहिए।' सत्ताईसवाँ महादण्डकद्वार : विभिन्न विवक्षाओं से सर्वजीवों के अल्पबहुत्व का निरूपण 334. प्रह भंते ! सव्वजोवष्पबहुं महादंडयं वत्तइस्सामि-सव्वस्थोवा गम्भवक्कंतिया मणुस्सा 1, मणुस्सोओ संखेज्जगुणाओ 2, बादरतेउक्काइया पज्जत्तया असंखेज्जगुणा 3, प्रणुत्तरोववाइया देवा असंखेज्जगुणा 4, उवरिमगेवेज्जगा देवा संखेज्जगुणा 5, मज्झिमगेवेज्जगा देवा संखेज्जगणा 6, हेट्टिमगेवेज्जगा देवा संखेज्जगुणा 7, अच्चुते कप्पे देवा संखेज्जगुणा 8, प्रारणे कप्पे देवा संखेज्जगुणा 6, पाणए कप्पे देवा संखेज्जगुणा 10, आणए कप्पे देवा संखेज्जगणा 11, अधेसत्तमाए पुढवीए नेरइया असंखेज्जगुणा 12, छट्ठीए तमाए पुढवीए नेरइया असंखेज्जगुणा 13, सहस्सारे कप्पे देवा असंखेज्जगुणा 14, महासुक्के कप्पे देवा असंखेज्जगुणा 15, पंचमाए धूमप्पभाए पुढवीए नेरइया असंखेज्जगुणा 16, लंतए कप्पे देवा असंखेज्जगुणा 17, चउत्थीए पंकप्पभाए पुढवीए नेरइया असंखेज्जगुणा 18, बंभलोए कप्पे देवा असंखेज्जगुणा 16, तच्चाए वालुयप्पभाए पुढवीए नेरइया असंखेज्जगुणा 20, माहिंदकप्पे देवा असंखेज्जगुणा 21, सणकुमारे कप्पे देवा असंखेज्जगुणा 22, दोच्चाए सक्करप्पभाए पुढवीए नेरइया असंखेज्जगुणा 23, सम्मुच्छिममणुपसा असंखेज्जगुणा 24, ईसाणे कप्पे देवा असंखेज्जगुणा 25, ईसाणे कप्पे देवोनो संखेज्जगुणाम्रो 26, सोहम्मे कप्पे देवा संखेज्जगुणा 27, सोहम्मे कप्पे देवोनो संखेज्जगुणानो 28, भवणवासी देवा असंखेज्जगुणा 26, भवणवासिणीनो देवोनो संखेज्जगुणानो 30, इमोसे रतणप्पभाए पुढवीए नेरइगा असंखेज्जगुणा 31, 1. प्रज्ञापनासूत्र, मलय. वृत्ति, पत्रांक 161 Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003483
Book TitleAgam 15 Upang 04 Pragnapana Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorShyamacharya
AuthorMadhukarmuni, Gyanmuni, Shreechand Surana, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1983
Total Pages1524
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size37 MB
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