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________________ 252] [ प्रज्ञापनासूत्र [266 प्र.] भगवन् ! इन भवसिद्धिक, अभवसिद्धिक और नोभवसिद्धिक-नोअभवसिद्धिक जीवों में से कौन किन से अल्प, बहुत, तुल्य अथवा विशेषाधिक हैं ? [266 उ.] गौतम ! 1. सबसे थोड़े अभवसिद्धिक जीव हैं, 2. (उनसे) नोभवसिद्धिकनोप्रभवसिद्धिक जीव अनन्तगुणे हैं और (उनसे भी) 3. भवसिद्धिक जीव अनन्तगुणे हैं / ___ बीसवाँ (भव) द्वार // 20 // विवेचन-बीसवाँ भवसिद्धिकद्वार : भवसिद्धिकद्वार के माध्यम से जीवों का अल्पबहत्वप्रस्तुत सूत्र (266) में भवसिद्धिक, अभवसिद्धिक और नोभवसिद्धिक नोप्रभवसिद्धिक जीवों का अल्पबहुत्व प्रतिपादित किया गया है। सबसे कम अभवसिद्धिकः अभव्य-मोक्षगमन के अयोग्य जीव हैं, क्योंकि वे जघन्य युक्तानन्तक प्रमाण वाले हैं। अनुयोगद्वार के अनुसार-'उत्कृष्ट परीतानन्त में एक रूप (संख्या) मिलाने से 'जघन्य युक्तानन्तक' होता है; अभवसिद्धिक उतने ही हैं। उनकी अपेक्षा नोभवसिद्धिक-नोश्रभवसिद्धिक अनन्तगुणे हैं, क्योंकि जो भव्य भी नहीं और अभव्य भी नहीं, ऐसे जीव सिद्ध हैं और वे अजघन्योत्कृष्ट युक्तानन्तक-परिमाण हैं, इस कारण वे अनन्त हैं / उनकी अपेक्षा भवसिद्धिक-भव्यमोक्षगमनयोग्य जीव अनन्तगुणे हैं, क्योंकि सिद्ध एक भव्यनिगोदराशि के अनन्तभागकल्प होते हैं और ऐसी भव्य जीवनिगोदराशियाँ लोक में असंख्यात हैं। इक्कीसवाँ अस्तिकायद्वार : अस्तिकायद्वार के माध्यम से षड्द्रव्य का अल्पबहुत्व 270. एतेसि णं भंते ! धम्मस्थिकाय-प्रधम्मस्थिकाय-मागासथिकाय-जीवस्थिकाय-पोग्गलथिकाय-प्रद्धासमयाणं दवट्टयाए कतरे कतरेहितो अप्पा वा बहुया वा तुल्ला वा विसेसाहिया वा ? गोयमा! धम्मत्थिकाए अधम्मस्थिकाए प्रागासस्थिकाए य एए तिन्नि वि तुल्ला दन्वयाए सम्वत्थोवा 1, जीवस्थिकाए दवट्ठयाए अणंतगुणे 2, पोग्गलस्थिकाए दवट्ठयाए अणंतगुणे 3, प्रद्धासमए दव्धट्टयाए अणंतगुणे 4 / 270 प्र.] भगवन् ! धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय, आकाशास्तिकाय, जीवास्तिकाय, पुद्गलास्तिकाय और अद्धा-समय (काल) इन द्रव्यों में से, द्रव्य की अपेक्षा से कौन किससे अल्प, बहुत, तुल्य अथवा विशेषाधिक है ? [270 उ.] गौतम ! 1. धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय और आकाशास्तिकाय, ये तीनों ही तुल्य हैं तथा द्रव्य की अपेक्षा से सबसे अल्प हैं; 2. (इनकी अपेक्षा) जीवास्तिकाय द्रव्य की अपेक्षा से अनन्तगुण है; 3. (इससे) पुद्गलास्तिकाय द्रव्य की अपेक्षा से अनन्तगुण है; 4. (और इससे भी) अद्धा-समय (कालद्रव्य) द्रव्य की अपेक्षा से अनन्तगुण है। 271. एएसि णं भंते ! धम्मस्थिकाय-अधम्मस्थिकाय-पागासस्थिकाय-जीवस्थिकाय-पोग्गलत्थिकाय-श्रद्धासमयाणं पदेसट्टयाए कतरे कतरेहितो अप्पा वा बहुया वा तुल्ला वा विसेसाहिया वा? 1. 'उक्कोसए परित्ताणतए रूके पक्खिते जहन्नयं जुत्ताणतयं होइ, अभवसिद्धिया वि तत्तिया चेव' –अनुयोगद्वार 2. प्रज्ञापनासूत्र मलय. वृत्ति, पत्रांक 140 Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003483
Book TitleAgam 15 Upang 04 Pragnapana Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorShyamacharya
AuthorMadhukarmuni, Gyanmuni, Shreechand Surana, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1983
Total Pages1524
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size37 MB
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