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________________ तृतीय बहुवक्तव्यतापद [247 सबसे थोड़े अवधिदर्शनी जीव इसलिए हैं कि अवधिदर्शन देवों, नारकों और कतिपय संज्ञीतिर्यंच पंचेन्द्रिय जीवों और मनुष्यों को ही होता है / उनकी अपेक्षा चक्षुदर्शनी जीव असंख्यातगुणे हैं, क्योंकि चक्षुदर्शन सभी देवों, नारकों, गर्भज मनुष्यों, संज्ञी तियंचपंचेन्द्रियों, असंज्ञो तिर्यंचयंचेन्द्रियों रिन्द्रिय जीवों को भी होता है। उनकी अपेक्षा केवलदर्शनी अनन्तगणे हैं. क्योंकि सिद्ध अनन्त हैं / उनकी अपेक्षा भी अचक्षुर्दशनी अनन्तगुणे हैं, क्योंकि अचक्षुर्दर्शनियों में वनस्पतिकायिक भी हैं, जो अकेले ही सिद्धों से अनन्तगणे हैं।' बारहवाँ संयतद्वार : संयत आदि की अपेक्षा जीवों का अल्पबहुत्व 261. एतेसि णं भंते ! जीवाणं संजयाणं असंजयाणं संजयासंजयाणं नोसंजयनोअसंजयनोसंजतासंजताण य कतरे कतरेहितो अप्पा वा बहुया वा तुल्ला वा विसेसाहिया वा? गोयमा ! सम्वत्थोवा जीवा संजता 1, संजयासंजता असंखेज्जगुणा 2, नोसंजतनोप्रसंजतनोसंजतासंजता अणंतगुणा 3, असंजता प्रणतगुणा 4 / दारं 12 // 261 प्र.] भगवन् ! इन संयतों, असंयतों, संयतासंयतों और नोसंयत-नोअसंयत-नोसंयतासंयत जीवों में से कौन किनसे अल्प, बहुत, तुल्य और विशेषाधिक हैं ? [261 उ.] गौतम ! 1. सबसे अल्प संयत जीव हैं, 2. (उनसे) संयतासंयत असंख्यातगुणे हैं, 3. (उनसे) नोसंयत-नोअसंयत-नोसंयतासंयत जीव अनन्तगुणे हैं (और उनसे भी) 4. असंयत जीव अनन्तगुणे हैं। बारहवाँ (संयत) द्वार / / 12 / / विवेचम--बारहवाँ संयतद्वार : संयत प्रादि की अपेक्षा से जीवों का अल्पबहुत्व-प्रस्तुत सूत्र (261) में संयत, असंयत, संयतासंयत एवं नोसंयत-तोअसंयत-नोसंयतासंयत की दृष्टि से जीवों के अल्पबहुत्व का निरूपण किया गया है। सबसे थोड़े संयत हैं, क्योंकि मनुष्यलोक में वे उत्कृष्टत: (अधिक से अधिक) कोटिसहस्रपृथक्त्व, अर्थात् -दो हजार करोड़ से नौ हजार करोड़ तक ही पाए जाते हैं। उनकी अपेक्षा संयतासंयत (देशविरत) असंख्यातगुणे हैं, क्योंकि मनुष्य के अतिरिक्त असंख्यात तिर्यचपंचेन्द्रियों में भी देशविरति पाई जाती है। उनसे नोसंयत-नोअसंयत (नोसंयतासंयत) अनन्तगुणे हैं, क्योंकि जो संयत, असंयत तथा संयतासंयत तीनों नहीं कहे जा सकते, ऐसे सिद्ध जीव अनन्त हैं। उनसे असंयत अनन्तगुणे हैं, क्योंकि वनस्पतिकायिक जीव भी असंयत हैं और वे अकेले ही सिद्धों से अनन्तगुणे हैं 13 तेरहवां उपयोगद्वार : उपयोगद्वार की दृष्टि से जीवों का अल्पबहुत्व 262. एतेसि णं भंते ! जीवाणं सागारोवउत्ताणं अणागारोवउत्ताण य कतरे कतरेहितो अप्पा वा बहुया वा तुल्ला वा विसेसाहिया वा? गोयमा ! सव्वत्थोवा जीवा प्रणागारोवउत्ता 1, सागारोवउत्ता संखेज्जगुणा 2 / दारं 13 / / 1. प्रज्ञापनासूत्र मलय. वृत्ति, पत्रांक 138 2. 'कोडिसहस्सपुहुत्तं मणुयलोए संजयाणं' ---प्रज्ञापना. म. वृत्ति, पृ. 138 3. प्रज्ञापनासूत्र मलय. वृत्ति, पत्रांक 138 Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003483
Book TitleAgam 15 Upang 04 Pragnapana Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorShyamacharya
AuthorMadhukarmuni, Gyanmuni, Shreechand Surana, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1983
Total Pages1524
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size37 MB
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