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________________ से) वि तृतीय बहुवक्तव्यतापद [ 245 [257 प्र.] भगवन् ! आभिनिबोधिकज्ञानी, श्रुतज्ञानी, अवधिज्ञानी मनःपर्यवज्ञानी और केवलज्ञानी जीवों में से कौन किनसे अल्प, बहुत, तुल्य अथवा विशेषाधिक हैं ? [257 उ.] गौतम ! 1. सबसे अल्प मनःपर्यवज्ञानी हैं, 2. (उनसे) अवधिज्ञानी असंख्यातगुणे हैं 3. आभिनिबोधिक (मति) ज्ञानी और और श्रुतज्ञानी; ये दोनों तुल्य हैं और (अवधिज्ञानियों से) विशेषाधिक हैं, 4. (उनसे) केवलज्ञानी अनन्तगुणे हैं। 258. एतेसि णं भंते ! जीवाणं मइअण्णाणोणं सुतअण्णाणीणं विहंगणाणीण य कतरे कतरेहितो अप्पा वा बहुया वा तुल्ला वा विसेसाहिया वा? __ गोयमा ! सम्वत्थोवा जीवा विभंगणाणी 1, मइअण्णाणी सुतअण्णाणी दो वि तुल्ला प्रणंतगुणा 2 / [258 प्र.] भगवन् ! इन मति-अज्ञानी, श्रुत-अज्ञानी और विभंगज्ञानी जीवों में से कौन किनसे अल्प, बहुत, तुल्य अथवा विशेषाधिक होते हैं ? [258 उ.] गौतम ! 1. सबसे थोड़े विभंगज्ञानी हैं, 2. मति-अज्ञानी और श्रुत-अज्ञानी दोनों तुल्य हैं और (विभंगज्ञानियों से) अनन्तगुणे हैं / 259. एतेसि गं भंते ! जीवाणं प्राभिणिबोहियणाणीणं सुयणाणीणं प्रोहिणाणीणं मणपज्जवणाणीणं केवलणाणोणं मतिअण्णाणीणं सुतअण्णाणोणं विभंगनाणीण य कतरे कतरेहितो अप्पा वा बहुया वा तुल्ला वा विसेसाहिया वा? गोयमा ! सम्वत्थोवा जीवा मणपज्जवणाणी 1, प्रोहिणाणी असंखेज्जगुणा 2, प्राभिणिबोहियणाणी सुतणाणी य दो वि तुल्ला विसेसाहिया 3, विहंगणाणी असंखेज्जगुणा 4, केवलणाणी अणंतगुणा 5, मइअण्णाणी सुतअण्णाणी य दो वि तुल्ला अणंतगुणा 6 / दारं 10 // [259 प्र.] भगवन् ! इन आभिनिबोधिकज्ञानी, श्रुतज्ञानी, अवधिज्ञानी, मन:पर्यवज्ञानी, केवलज्ञानी, मतिअज्ञानी, श्रुतअज्ञानी और विभंगज्ञानी जीवों में से कौन किनसे अल्प, बहुत, तुल्य अथवा विशेषाधिक हैं ? [256 उ.] गौतम ! 1. सबसे अल्प मन:पर्यवज्ञानी जीव हैं, 2. (उनसे) अवधिज्ञानी असंख्यातगुणे हैं, 3. प्राभिनिबोधिकज्ञानी और श्रुतज्ञानी दोनों तुल्य हैं और (अवधिज्ञानियों से) विशेषाधिक हैं, 4. (उनसे) विभंगज्ञानी असंख्यातगुणे हैं, 5. (उनसे) केवलज्ञानी अनन्तगुणे हैं, 6. मति-अज्ञानी और श्रुत-अज्ञानी, दोनों तुल्य हैं और (केवलज्ञानियों से) अनन्तगुणे हैं। दशम (ज्ञान) द्वार / / 10 // विवेचन-दसवाँ ज्ञानद्वार : ज्ञान-प्रज्ञान की अपेक्षा से जीवों का प्रल्पबहुत्व-प्रस्तुत तीन सूत्रों (257 से 256 तक) में पांच ज्ञान और तीन अज्ञान की दृष्टि से जीवों के अल्पबहुत्व का विचार किया गया है। ज्ञान की अपेक्षा से अल्पबहुत्व-सबसे थोड़े मनःपर्यायज्ञानी हैं, क्योंकि मनःपर्यवज्ञान आमर्षऔषधि आदि ऋद्धिप्राप्त संयमी पुरुषों को ही होता है / उनकी अपेक्षा अवधिज्ञानी असंख्यातगुणे हैं, क्योंकि अवधिज्ञान नारकों, तिर्यञ्चपंचेन्द्रियों, मनुष्यों और देवों को भी होता है / उनसे आभिनिबोधिक Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003483
Book TitleAgam 15 Upang 04 Pragnapana Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorShyamacharya
AuthorMadhukarmuni, Gyanmuni, Shreechand Surana, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1983
Total Pages1524
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size37 MB
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