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________________ तृतीय बहुवक्तव्यतापद ] [217 (4) पर्याप्तक-अपर्याप्तक जीवों का प्रल्पबहत्व-सबसे कम सेन्द्रिय अपर्याप्तक जीव हैं, क्योंकि, सेन्द्रियों में सूक्ष्म-एकेन्द्रिय ही सर्वलोकव्याप्त होने के कारण बहुत हैं, किन्तु उनमें अपर्याप्त सबसे कम होते हैं। उनकी अपेक्षा सेन्द्रिय-पर्याप्त संख्यातगुणे अधिक हैं। इसी प्रकार एकेन्द्रिय अपर्याप्त सबसे कम और पर्याप्त उनसे संख्यातगुणे अधिक हैं। द्वीन्द्रियों में पर्याप्तक सबसे कम हैं, क्योंकि वे प्रतरांगुल के संख्येयभागमात्रखण्ड-प्रमाण हैं, जबकि द्वीन्द्रिय-अपर्याप्तक प्रतरवर्ती अंगुल के असंख्येयभागखण्ड-प्रमाण होते हैं। इसके पश्चात् त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय और पंचेन्द्रिय जीवों में प्रत्येक में पर्याप्तक सबसे कम हैं, अपर्याप्तक उनसे असंख्यातगुणे हैं, कारण वही पूर्ववत् समझना चाहिए / (5) समुच्चय में सेन्द्रिय आदि समुदित पर्याप्त-अपर्याप्त जीवों का अल्पबहुत्व-इनमें सबसे कम चतुरिन्द्रिय पर्याप्तक हैं, कारण पहले बताया जा चुका है। उनसे पंचेन्द्रिय पर्याप्तक, द्वीन्द्रिय पर्याप्तक, त्रीन्द्रिय पर्याप्तक, ये तीनों क्रमशः उत्तरोत्तर विशेषाधिक हैं। उनसे पंचेन्द्रिय अपर्याप्त, चतुरिन्द्रिय अपर्याप्त, त्रीन्द्रिय अपर्याप्त एवं द्वीन्द्रिय अपर्याप्तक क्रमश: उत्तरोत्तर असंख्यातगुणे, विशेषाधिक, विशेषाधिक एवं विशेषाधिक हैं। आगे क्रमशः एकेन्द्रिय अपर्याप्त उनसे अनन्त गुणे सेन्द्रिय अपर्याप्तक विशेषाधिक, एकेन्द्रिय पर्याप्तक संख्यातगुणे, सेन्द्रिय पर्याप्तक विशेषाधिक तथा सेन्द्रिय जीव इनसे भी विशेषाधिक होते हैं। इनके अल्पबहुत्व का कारण पूर्ववत् समझ लेना चाहिए।' चतुर्थ कायद्वार : काय की अपेक्षा से सकायिक, अकायिक एवं षट्कायिक जीवों का अल्पबहुत्व 232. एएसि णं भंते ! सकाइयाणं पुढविकाइयाणं प्राउकाइयाणं तेउकाइयाणं वाउकाइयाणं वणस्सतिकाइयाणं तसकाइयाणं प्रकाइयाण य कतरे कतरेहितो अप्पा वा बहुया वा तुल्ला वा विसेसाहिया वा? गोयमा ! सम्वत्थोवा तसकाइया 1, तेउकाइया असंखेज्जगुणा 2, पुढविकाइया विसेसाहिया 3, प्राउकाइया विसेसाहिया 4, वाउकाइया विसेसाहिया 5, प्रकाइया अणंतगुणा 6, वणस्सइकाइया असंखगुणा 7, सकाइया विसेसाहिया 8 / [232 प्र.] भगवन् ! इन सकायिक, पृथ्वीकायिक, अप्कायिक, तेजस्कायिक, वायुकायिक, वनस्पतिकायिक, असकायिक और अकायिक जीवों में से कौन किनसे अल्प, बहुत, तुल्य अथवा विशेषाधिक हैं ? [232 उ.] गौतम ! 1. सबसे अल्प त्रसकायिक हैं, 2. (उनसे) तेजस्कायिक असंख्यातगुणे हैं, 3. (उनसे) पृथ्वीकायिक विशेषाधिक हैं, 4. (उनसे) अप्कायिक विशेषाधिक हैं, 5. (उनसे) वायुकायिक विशेषाधिक हैं, 6. (उनसे) अकायिक अनन्तगुणे हैं, 7. (उनसे) वनस्पतिकायिक अनन्तगुणे हैं, 8. और (उनसे भी) सकायिक विशेषाधिक हैं। 233. एतेसि णं भंते ! सकाइयाणं पुढविकाइयाणं प्राउकाइयाणं तेउकाइयाणं वाउकाइयाणं वणस्सतिकाइयाणं तसकाइयाण य अपज्जत्तयाणं कतरे कतरेहितो अप्पा वा बहुया वा तुल्ला वा विसेसाहिया वा? 1. प्रज्ञापनासूत्र मलय. वृत्ति, पत्रांक 121, 122 Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003483
Book TitleAgam 15 Upang 04 Pragnapana Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorShyamacharya
AuthorMadhukarmuni, Gyanmuni, Shreechand Surana, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1983
Total Pages1524
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size37 MB
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