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________________ [प्रज्ञापनासूत्र अपर्याप्तक विशेषाधिक हैं / 7. (उनसे) त्रीन्द्रिय अपर्याप्तक विशेषाधिक हैं। 8 (उनसे) द्वीन्द्रिय अपर्याप्तक विशेषाधिक हैं / 6. (उनसे) एकेन्द्रिय अपर्याप्तक अनन्तगुणे हैं / 10. (उनसे) सेन्द्रिय अपर्याप्तक विशेषाधिक हैं। 11. (उनसे) एकेन्द्रिय पर्याप्तक संख्यातगुणे हैं 12. (और उनसे) सेन्द्रिय पर्याप्तक विशेषाधिक हैं 13. (तथा उनसे भी) सेन्द्रिय (इन्द्रियवान्) विशेषाधिक हैं। हार ||3|| विवेचन-तृतीय इन्द्रियद्वार : इन्द्रियों की अपेक्षा से जीवों का अल्पबहत्व—प्रस्तुत पांच सूत्रों (सू. 227 से 231 तक) में इन्द्रियों की अपेक्षा से सेन्द्रिय, अनिन्द्रिय तथा एकेन्द्रिय से लेकर पंचेन्द्रिय जीवों तक के अल्पबहुत्व की प्ररूपणा विभिन्न पहलुओं से की गई है। (1) सेन्द्रिय-अनिन्द्रिय तथा एकेन्द्रिय से पंचेन्द्रिय तक के जीवों का अल्पबहुत्व-सबसे कम पंचेन्द्रिय (पांचों इन्द्रियों वाले नारक, तियंच, मनुष्य और देव) जीव हैं, क्योंकि वे संख्यात कोटाकोटी-योजनप्रमाण विष्कम्भसूची से प्रमित प्रतर के असंख्येयभागवर्ती असंख्येय श्रेणीगत प्राकाशप्रदेशों की राशि-प्रमाण हैं। उनसे विशेषाधिक चार इन्द्रियों वाले भ्रमर आदि चतुरिन्द्रिय जीव हैं; क्योंकि वे विष्कम्भसूची के प्रचुर संख्येयकोटाकोटीयोजनप्रमाण हैं। उनसे त्रीन्द्रिय (चींटी आदि तीन इन्द्रियों वाले) जीव विशेषाधिक हैं, क्योंकि वे विष्कम्भसूची से प्रचुरतर संख्यातकोटाकोटीयोजनप्रमाण हैं / द्वीन्द्रिय (शंख आदि दो इन्द्रियों वाले) जीव उनकी अपेक्षा विशेषाधिक हैं, क्योंकि वे विष्कम्भसूची के प्रचुरतम संख्येयकोटाकोटीयोजनप्रमाण हैं। द्वीन्द्रियों से अनिन्द्रिय (सिद्ध) जीव अनन्तगुणे हैं, क्योंकि वे अनन्त हैं। अनिन्द्रियों से एकेन्द्रिय जीव अनन्तगुणे हैं, क्योंकि अकेले वनस्पतिकायिक जीव सिद्धों से अनन्तगुणे अधिक हैं। एकेन्द्रिय जीवों से भी सेन्द्रिय (सभी इन्द्रियों वाले) जीव विशेषाधिक हैं, क्योंकि द्वीन्द्रिय प्रादि सभी जीवों का उसमें समावेश हो जाता है / यह समुच्चय जीवों का अल्पबहुत्व हुआ। (2) अपर्याप्त समुच्चय जीवों का अल्पबहुत्व-अपर्याप्त पंचेन्द्रिय जीव सबसे थोड़े हैं, क्योंकि वे एक प्रतर में जितने भी अंगुल के असंख्यात भागमात्र खण्ड होते हैं, उतने ही हैं। उनसे चतुरिन्द्रिय अपर्याप्त विशेषाधिक इसलिए हैं कि वे प्रचुर अंगुल के असंख्यातभाग खण्डप्रमाण हैं। उनसे त्रीन्द्रिय अपर्याप्त विशेषाधिक हैं, क्योंकि वे प्रचुरतरप्रतरांगुल के असंख्येयभागखण्डप्रमाण हैं। द्वीन्द्रिय अपर्याप्त उनसे विशेषाधिक हैं; क्योंकि वे प्रचुरतम प्रतरांगुल के असंख्यातभागखण्ड-प्रमाण हैं / एकेन्द्रिय अपर्याप्त उनसे अनन्तगुणे हैं, क्योंकि अपर्याप्त वनस्पतिकायिक सदैव अनन्त पाए जाते हैं। इनसे विशेषाधिक सेन्द्रिय अपर्याप्त जीव हैं, क्योंकि सेन्द्रिय सामान्य जीवों में एकेन्द्रिय, द्वीन्द्रिय आदि सभी इन्द्रियवान् जीवों का समावेश हो जाता है। (3) पर्याप्तक जीवों का अल्पबहत्व-चतुरिन्द्रिय पर्याप्तक जीव सबसे अल्प हैं, क्योंकि चतुरिन्द्रिय जीवों की आयु बहुत अल्प होती है, इसलिए अधिक काल तक न रहने से वे प्रश्न के समय थोड़े ही पाए जाते हैं। उनकी अपेक्षा पंचेन्द्रिय-पर्याप्तक विशेषाधिक हैं, क्योंकि वे प्रचुर प्रतरांगुल के असंख्येयभाग-खण्ड-प्रमाण हैं। उनसे द्वीन्द्रिय-पर्याप्तक विशेषाधिक हैं, क्योंकि वे प्रचुरतर प्रतरांगुल के संख्यातभाग-प्रमाण खण्डों के बराबर हैं। उनकी अपेक्षा त्रीन्द्रिय पर्याप्तक विशेषाधिक होते हैं, क्योंकि वे स्वभावतः प्रचुरतम प्रतरांगुल के संख्यातभागप्रमाण खण्डों के बराबर हैं। उनसे अनन्तगुणे एकेन्द्रिय पर्याप्तक हैं, क्योंकि अकेले बनस्पतिकायिक जीव अनन्त होते हैं। सेन्द्रिय-पर्याप्त उनसे भी विशेषाधिक हैं, क्योंकि उनमें पर्याप्तक द्वीन्द्रिय आदि का भी समावेश हो जाता है। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003483
Book TitleAgam 15 Upang 04 Pragnapana Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorShyamacharya
AuthorMadhukarmuni, Gyanmuni, Shreechand Surana, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1983
Total Pages1524
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size37 MB
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