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________________ कहा जा सकता है कि भिन्न-भिन्न प्राचार्यों ने भिन्न-भिन्न काल में जो विचार किया, और परम्परा से श्यामाचार्य को जो प्राप्त हुआ, उसे उन्होंने संगहीत-संकलित किया। इस दृष्टि से विचार करें तो प्रज्ञापना उस काल की विचार-परम्परा का व्यवस्थित संग्रह है। यही कारण है कि जब आगम लिपिबद्ध किये गए, तब उस-उस विषय की समग्र विचारणा के लिए प्रज्ञापनासूत्र का प्रतिदेश किया गया / जैनागमों के मुख्य दो विषय हैं. जीव और कर्म / एक विचारणा जीव को केन्द्र में रखकर उसके अनेक विषयों की--(जैसे कि उसके कितने प्रकार हैं, वे कहाँ-कहाँ रहते हैं ? उनका आयुष्य कितना है ? वे मर कर कहां-कहाँ जाते हैं ? कहाँ-कहाँ से किस गति या योनि में आते हैं ? उनकी इन्द्रियाँ कितनी ? वेद कितने ? ज्ञान कितने ? उनके कर्म कौन-कौन से बंधते हैं ? आदि) की जाती है / दूसरी विचारणा कर्म को केन्द्र में रख कर की जाती है। जैसे कि कर्म कितने प्रकार के हैं ? विविध प्रकार के जीवों के विकास और ह्रास में उनका कितना हिस्सा है ? अादि / 22 प्रज्ञापना में प्रथम प्रकार से विचारणा की गई है। प्रस्तुत सम्पादन स्थानकवासी जैनसमाज जागरूक रह कर आगमों एवं जैनसिद्धान्तों के प्रति पूर्ण श्रद्धाशील रहा है ।समय-समय पर आगमों के गढ़भावों को समझाने के लिए स्थानकवासी समाज के अनेक आगमवेत्ताओं ने अपने युग की भाषा में उनका अनुवाद एवं विवेचन किया है / जिस समय टब्बा युग पाया, उस समय प्राचार्य श्री धसिंहजी ने सत्ताईस आगमों पर बालावबोध टब्बे लिखे, जो मूलस्पर्शी एवं शब्दार्थ को स्पष्ट करने वाले हैं। अनुवादयुग में शास्त्रोद्धारक आचार्यश्री अमोलकऋषिजी म. ने बत्तीस आगमों का हिन्दी-अनुवाद किया / पूज्य गुरुदेव श्रमण संघ के प्रथम आचार्य जैनधर्मदिवाकर श्री आत्मारामजी महाराज ने अनेक आगमों का हिन्दी-अनुवाद एवं विस्तृत व्याख्या लिखो। तत्पश्चात् पूज्य थो घासीलालजी महाराज ने संस्कृत में विस्तृत टीका हिन्दी-गुजराती-अनुवादसहित लिखी। और भी अनेक स्थलों से प्रागम-साहित्य प्रकाशित हया। किन्तु जनसाधारण को तथा वर्तमान-तर्कप्रधानयुग की जनता को संतुष्ट कर सके, ऐसे न अतिविस्तृत और न अतिसक्षिप्त संस्करण की मांग निरन्तर बनी रही। अतः प्रागममर्मज्ञ बहश्रत विद्वान श्रमणसंघ के युवाचार्य श्री मिश्रीमलजी महाराज 'मधुकर' के प्रधानसम्पादन निर्देशन में तथा पं. कन्हैयालालजी म. 'कमल' पं. देवेन्द्रमुनिजी शास्त्री श्री रतन मुनि जी म. एवं पं. शोभाचन्द्रजी भारिल्ल जैसे विद्वद्वर्य सम्पादकमण्डल के तत्वावधान में प्रज्ञापनासूत्र का प्रस्तुत अभिनव संस्करण अनुवादित एवं सम्पादित किया गया है। प्रज्ञापनासूत्र के इस संस्करण की यह विशेषता है कि इसमें श्री महावीर जैन विद्यालय, वम्बई से प्रकाशित 'पण्णवणासुत्तं' के शुद्ध मूलपाठ का अनुसरण किया गया है। इससे यह लाभ हुआ कि सूत्र संख्या छत्तीस पदों की क्रमशः दी गई है / प्रत्येक सूत्र में प्रश्न को अलग पंक्ति में रखा गया है, उत्तर अलग पंक्ति में। तथा प्रत्येक प्रकरण के शोर्षक-उपशीर्षक पृथक-पृथक् दिये गए हैं, जिससे 22. पण्णवणासुत्तं भा. 2 प्रस्तावना, पृ. 20-21 [22] Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003483
Book TitleAgam 15 Upang 04 Pragnapana Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorShyamacharya
AuthorMadhukarmuni, Gyanmuni, Shreechand Surana, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1983
Total Pages1524
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size37 MB
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