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________________ द्वितीय स्थानपद [191 प्रोगाहणाए सिद्धा भवत्तिमागेण होंति परिहीणा / संठाणमणित्थंथं जरा-मरणविप्पमक्काणं // 166 // जस्थ य एगो सिद्धो तत्थ अणंता भवक्खयविमुषका / अण्णोण्णसमोगाढा पुट्ठा सम्वे वि लोयंते // 167 / / फुसइ प्रणते सिद्ध सम्यपएसेहि नियमसो सिद्धा। ते वि असंखेज्जगुणा देस-पदेसेहि जे पुट्ठा // 16 // प्रसरीरा जीवघणा उवउत्ता दंसणे य नाणे य / सागारमणागारं लक्खणमेयं तु सिद्धाणं / / 166 // केवलणाणुवउत्ता जाणंती सव्वभावगुण-मावे / पासंति सव्वतो खलु केवलट्ठिीहऽणंताहिं // 17 // न वि अस्थि माणुसाणं तं सोक्खं न वि य सव्वदेवाणं / जं सिद्धाणं सोक्खं अम्बाबाहं उवगयाणं // 17 // सुरगणसुहं समत्तं सम्वद्धापिडितं प्रणतगुणं / ण वि पावे मुत्तिसुहं गंताहिं वि वग्गवग्गृहि // 172 / / सिद्धस्स सुहो रासी सव्वद्धापिडितो जइ हवेज्जा / सोऽणंतवग्गभइतो सव्वागासे ण माएज्जा // 173 // जह णाम कोइ मेच्छो जगरगुणे बहुविहे वियाणंतो। न चएइ परिकहेउं उवमाए तहिं असंतोए / / 174 / / इय सिद्धाणं सोक्खं प्रणोवम, णस्थि तस्स प्रोवम्म / किचि विसेसेणेत्तो सारिक्खमिणं सुणह वोच्छं / / 17 / / जह सम्वकामगुणितं पुरिसो भोत्तण भोयणं कोइ। तण्हा-छुहाविमुक्को प्रच्छेज्ज जहा अमियतित्तो // 176 // इय सव्वकालतित्ता अतुलं व्याणमुवगया सिद्धा। सासयमव्वाबाहं चिट्ठति सुही सुहं पत्ता // 177 / / सिद्ध त्ति य बुद्ध त्ति य पारगत त्ति य परंपरगत त्ति / उम्मुक्ककम्मकवया अजरा अमरा प्रसंगा य // 17 // णित्थिन्नसव्वदुक्खा जाति-जरा-मरणबंधणविमुक्का / प्रवाबाहं सोक्खं अणुहुंती सासयं सिद्धा // 17 // // पण्णवणाए भगवईए बिइयं ठाणपयं समत्तं / / 1. [ग्रन्थाग्रम् 1500] 2. ग्रन्थाग्रम् 1520] Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003483
Book TitleAgam 15 Upang 04 Pragnapana Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorShyamacharya
AuthorMadhukarmuni, Gyanmuni, Shreechand Surana, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1983
Total Pages1524
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size37 MB
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