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________________ 182 ] / प्रज्ञापनासूत्र चालीस हजार विमानावासों का, चालीस हजार सामानिकों का, और चार चालीस हजार, अर्थात् एक लाख साठ हजार आत्मरक्षक देवों का अधिपतित्व करता हुआ.......(आगे का वर्णन सू. 196 के अनुसार) यावत् 'विचरण करता है' तक (समझना चाहिए / ) 204. [1] कहि णं भंते ! सहस्सारदेवाणं पज्जत्ताऽपज्जत्ताणं ठाणा पणत्ता ? कहि णं भंते ! सहस्सारदेवा परिवसंति ? __ गोयमा ! महासुक्कस्स कप्पस्स उप्पि सपक्खि सपडिदिसि जाव (स. 166 [1]) उप्पहत्ता एत्थ णं सहस्सारे णामं कप्पे पण्णते पाईण-पडीणायते जहा बंभलोए (सु. 201 [1]), णवरं छविमाणावाससहस्सा भवंतीति मक्खातं / देवा तहेव (स. 197 [1]) जाव बडेंसगा जहा ईसाणस्स वडेंसगा (सु. 168 [1]), णवरं मझे यऽथ सहस्सारवडेंसए जाव (सु. 166) विहरंति / 204-1 प्र.! भगवन् ! पर्याप्त और अपर्याप्त सहस्रार देवों के स्थान कहाँ कहे गए हैं ? भगवन् ! सहस्रार देव कहाँ निवास करते हैं ? 204-1 उ.] गौतम ! महाशुक्र कल्प के ऊपर समान दिशा और समान विदिशा में यावत् (सू. 199-1 के अनुसार) ऊपर दूर जाने पर, वहाँ सहस्रार नामक कल्प कहा गया है, जो पूर्वपश्चिम में लम्बा है, (इत्यादि समस्त वर्णन) जैसे (सू. 201-1 में) ब्रह्मलोक कल्प का है, (उसी प्रकार यहाँ भी समझना चाहिए / ) विशेष यह है कि (इस सहस्रार कल्प में) छह हजार विमानावास हैं, ऐसा कहा गया है। (सहस्रार) देवों का वर्णन सू. 197.1 के अनुसार यावत् 'अवतंसक हैं' तक उसी प्रकार (पूर्ववत्) कहना चाहिए। इनके अवतंसकों के विषय में ईशान (कल्प) के अवतंसकों की तरह (सू. 198-1 के अनुसार) जानना चाहिए। विशेष यह है कि इन (चारों) के बीच में (पांचवां) 'सहस्रारावतंसक' समझना चाहिए। (इससे आगे) यावत् 'विचरण करते हैं' तक का भी वर्णन (सू. 196 के अनुसार) जान लेना चाहिए / [2] सहस्सारे यऽत्थ देविदे देवराया परिवसति जहा सणंकुमारे (सु. 166 [2]), णवरं छण्हं विमाणावाससहस्साणं तीसाए सामाणियसाहस्सोणं चउण्ह य तीसाए प्रायरक्खदेवसाहस्सीणं जाव (सु. 166) प्राहेवच्चं कारेमाणे विहरति / [204-2] इसी स्थान पर देवेन्द्र देवराज सहस्रार निवास करता है। (उसका वर्णन) जैसे (सू. 199-2 में) सनत्कुमारेन्द्र का वर्णन है, उसी प्रकार (समझना चाहिए।) विशेष यह है कि (सहस्रारेन्द्र) छह हजार विमानावासों का, तीस हजार सामानिक देवों का और चार तीस हजार, अर्थात् -एक लाख बीस हजार आत्मरक्षक देवों का यावत् (सू. 196 के अनुसार बीच का वर्णन) आधिपत्य करता हुमा विचरण करता है। 205. [1] कहि णं भंते ! प्राणय-पाणयाणं देवाणं पज्जत्ताऽपरजत्ताणं ठाणा पण्णत्ता ? कहि णं भंते ! प्राणय-पाणया देवा परिवसंति ? गोयमा! सहस्सारस्स कप्पस्स उम्पि सपक्खि सपडिदिसि जाव (सु. 166 [1]) उप्पइत्ता एल्थ णं प्राणय-पाणयनामेणं दुवे कप्पा पण्णत्ता पाईण-पडीणायता उदीण-दाहिणविस्थिण्णा प्रद्धचंद. Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003483
Book TitleAgam 15 Upang 04 Pragnapana Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorShyamacharya
AuthorMadhukarmuni, Gyanmuni, Shreechand Surana, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1983
Total Pages1524
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size37 MB
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