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________________ द्वितीय स्थानपद ] [ 183 संठाणसंठिता अच्चिमाली-भासरासिप्पभा, सेसं जहा सणंकुमारे (सु. 166 [1]) जाव पडिरूवा / तत्थ णं प्राणय-पाणयदेवाणं चत्तारि विमाणावाससता भवंतीति मक्खायं जाव पडिरूवा। वडिसगा जहा सोहम्मे (सु. 197 [1]), गवरं मज्झे पाणयव.सए / ते णं बडेंसगा सव्वरयणामया अच्छा जाव पडिरूवा (सु. 166) / एत्थ णं प्राणय-पाणयदेवाणं पज्जत्ताऽपज्जात्ताणं ठाणा पण्णत्ता / तिसु वि लोगस्त असंखेज्जइभागे। तस्थ णं बहवे प्राणय-पाणयदेवा परिबसंति महिड्ढीया जाव (सु. 166) पभासेमाणा / ते णं तत्थ साणं साणं विमाणावाससयाणं जाव (सु. 196) विहरंति / [205-1 प्र. भगवन् ! पर्याप्तक और अपर्याप्तक आनत एवं प्राणत देवों के स्थान कहाँ कहे गए हैं ? भगवन् ! प्रानत-प्राणत देव कहाँ निवास करते हैं ? [205-1 उ.] गौतम ! सहस्रार कल्प के ऊपर समान दिशा और समान विदिशा में, (इत्यादि सू. 199-1 के अनुसार) यावत् ऊपर दुर जा कर, यहाँ अानत एवं प्राणत नाम के दो कल्प कहे गए हैं; जो पूर्व-पश्चिम में लम्बे और उत्तर-दक्षिण में विस्तीर्ण, अर्द्धचन्द्र के आकार में संस्थित, ज्योतिमाला और दीप्तिराशि की प्रभा के समान हैं, शेष सब वर्णन (स. 199-1 में उक्त) सनत्कुमारकल्प के वर्णन की तरह यावत् प्रतिरूप हैं, तक (समझना चाहिए।) उन कल्पों में आनत और प्राणत देवों के चार सौ विमानावास हैं, ऐसा कहा है; विमानावासों का वर्णन यावत् प्रतिरूप हैं, तक पूर्ववत् कहना चाहिए। जिस प्रकार सौधर्मकल्प के अवतंसक सू. 197-1 में कहे हैं, इसी प्रकार इनके अवतंसक कहने चाहिए। विशेष यह है कि इन (चारों) के बीच में (पांचवां) प्राणतावतंसक है / वे अवतंसक पूर्णरूप से रत्नमय हैं, स्वच्छ हैं, (बीच का वर्णन सू. 196 के अनुसार) यावत् 'प्रतिरूप हैं' तक कहना चाहिए / इन (अवतंसकों) में पर्याप्त-अपर्याप्त पानत-प्राणत देवों के स्थान कहे गए हैं / ये स्थान तीनों अपेक्षाओं से, लोक के असंख्यातवें भाग में हैं; जहाँ बहुत-से आनत-प्राणत देव निवास करते हैं, जो महद्धिक हैं, यावत् (बीच का पाठ सू. 196 के अनुसार) 'प्रभासित करते हुए' तक समझ लेना चाहिए / वे (मानत-प्राणत देव) वहाँ अपने-अपने सैकड़ों विमानों का यावत् प्राधिपत्य करते हुए विचरते हैं। [2] पाणए यऽस्थ देविदे देवराया परिवसति जहा सणंकुमारे (सु. 169 [2]), णवरं चउण्हं विमाणावाससयाणं वीसाए सामाणियसाहस्तीणं असीतीए आयरक्खदेवसाहस्सोणं अण्णेसि च बहूणं जाव (सु. 166) विहरति / [205-2] यहीं देवेन्द्र देवराज प्राणत निवास करता है, जिस प्रकार (सू. 199-2 में) सनत्कुमारेन्द्र का वर्णन है, (तदनुसार यहाँ भी प्राणतेन्द्र का समझना चाहिए।) विशेष यह है कि (यह प्राणतेन्द्र) चार सौ विमानावासों का, बीस हजार सामानिक देवों का तथा अस्सी हजार प्रात्मरक्षकदेवों का एवं अन्य बहुत-से देवों का अधिपतित्व करता हुआ यावत् 'विचरण करता है' तक (का वर्णन सू. 196 के अनुसार समझना चाहिए / ) 206. [1 / कहि णं भंते ! धारण-उच्चुताणं देवाणं पज्जत्ताऽपज्जाणं ठाणा पण्णता? कहि णं भंते ! पारण-ऽच्चुता देवा परिवसंति ? गोयमा ! प्राणय-पाणयाणं कप्पाणं उपि सपक्खि सपडिदिसि एत्य णं पारणऽच्चुया णाम दुवे Jain Education International www.jainelibrary.org For Private & Personal Use Only
SR No.003483
Book TitleAgam 15 Upang 04 Pragnapana Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorShyamacharya
AuthorMadhukarmuni, Gyanmuni, Shreechand Surana, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1983
Total Pages1524
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size37 MB
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