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________________ 180] [प्रज्ञापनासूत्र [201-1 प्र.] भगवन् ! पर्याप्त और अपर्याप्त ब्रह्मलोक देवों के स्थान कहाँ कहे गए हैं ? भगवन् ! ब्रह्मलोक देव कहाँ निवास करते हैं ? 201-1 उ.] गौतम ! सनत्कुमार और माहेन्द्र कल्पों के ऊपर समान पक्ष (पार्श्व या दिशा) और समान विदिशा में बहुत योजन यावत् ऊपर दूर जाने पर, वहाँ ब्रह्मलोक नामक कल्प है, जो पूर्व-पश्चिम में लम्बा और उत्तर-दक्षिण में विस्तीर्ण, परिपूर्ण चन्द्रमा के आकार का, ज्योतिमाला तथा दीप्ति राशि को प्रभा वाला है। शेष वर्णन, सनत्कुमारकल्प की तरह (सू. 166-1 के अनुसार) समझना चाहिए / विशेष यह है कि (इस कल्प में) चार लाख विमानावास हैं। इनके अवतंसक (स. 197-1 में कथित) सौधर्म-अवतंसकों के समान समझने चाहिए / विशेष यह है कि इन (चारों अवतंसकों) के मध्य में ब्रह्मलोक अवतंसक है; जहाँ कि ब्रह्मलोक देवों के स्थान कहे गए हैं। शेष वर्णन उसी प्रकार (सू. 196 में कथित वर्णन के अनुसार) यावत् 'विचरण करते हैं', तक समझना चाहिए। [2] बंभे यऽथ देविदे देवराया परिवसति प्ररयंबरवत्थधरे, एवं जहा सणंकुमारे (सु. 166 [2]) जाव विहरति / णवरं चउण्हं विमाणावाससतसहस्साणं सट्ठीए सामाणियसाहस्सीणं चउण्ह य सट्ठीणं पायरक्खदेवसाहस्सीणं प्रणेसि च बहूणं जाव (सु. 166) विहरति / [201-2] ब्रह्मलोकावतंसक में देवेन्द्र देवराज ब्रह्म निवास करता है; जो रज-रहित स्वच्छ वस्त्रों का धारक है, इस प्रकार जैसे (सू. 196-2 में) सनत्कुमारेन्द्र का वर्णन है, वैसे ही यहाँ यावत् 'विचरण करता है', तक कहना चाहिए / विशेष यह है कि (यह ब्रह्मन्द्र) चार लाख विमानावासों का, साठ हजार सामानिकों का, चार साठ हजार अर्थात्-दो लाख चालीस हजार आत्मरक्षक देवों का तथा अन्य बहुत से ब्रह्मलोककल्प के देवों का प्राधिपत्य करता हुआ (इत्यादि शेष वर्णन सू. 166 के अनुसार) यावत् 'विचरण करता है' तक (समझना चाहिए।) 202. [1] कहि णं भंते ! लतगदेवाणं पज्जत्ताऽपज्जत्ताणं ठाणा पण्णता ? कहि णं भंते ! लंतगदेवा परिवसंति ? गोयमा ! बंभलोगस्स कप्पस्स प्पि सपक्खि सपडिदिसि बहूई जोयणसयाइं जाव (सु. 166 [1]) बहुगोप्रो जोयणकोडाकोडोप्रो उड्डे दूरं उप्पइत्ता एत्थ णं लंतए णामं कप्पे पण्णत्ते पाईणपडीणायए जहा बंभलोए (सु. 201 [1]), णवरं पण्णासं विमाणावाससहस्सा भवंतीति मक्खायं / वडेंसगा जहा ईसाणवडेंसगा (सु. 168 [1]), णवरं माझे यऽथ लंतगवडेंसए / देवा तहेव जाव (सु. 166) विहरति / [202-1 प्र.] भगवन् ! पर्याप्त और अपर्याप्त लान्तक देवों के स्थान कहाँ कहे गए हैं ? भगवन् ! लान्तक देव कहाँ निवास करते हैं ? 202-1 उ.] गौतम ! ब्रह्मलोक कल्प के ऊपर समान दिशा और समान विदिशा में अनेक सौ योजन यावत् बहुत कोटाकोटी योजन ऊपर दूर जाने पर, लान्तक नामक कल्प कहा गया है, जो पूर्व-पश्चिम में लम्बा है; (इत्यादि सब वर्णन) जैसे (सू. 201-1 में) ब्रह्मलोक (कल्प) का (किया गया) है, (उसी तरह यहाँ भी करना चाहिए / ) विशेष यह है कि (इस कल्प में) पचास Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003483
Book TitleAgam 15 Upang 04 Pragnapana Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorShyamacharya
AuthorMadhukarmuni, Gyanmuni, Shreechand Surana, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1983
Total Pages1524
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size37 MB
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