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________________ 164] [प्रज्ञापनासूत्र गणा य निउणगंधव्वगीतरहणो 8 अणवणिय १-पणवाणिय २-इसिवाइय ३-भूयवाइय ४-कंदित ५-महाकंदिया य ६-कुहंड ७-पयगदेवा / __ 8 चंचलचलचवलचित्तकीलण-दवप्पिया गहिरहसिय-गीय-णच्चणरई वणमाला-मेल-मउलकुडल-सच्छंदवि उब्धियाभरणचारुभूसणधरा सब्बोउयसुरभिकुसुमसुरइयपलबसोहंतकंतवियसंतचित्त. वणमालरइयवच्छा कामकामा' कामरूबदेहधारी णाणाविहवण्णरागवरवत्थचिचिल्ल[ल] गणियंसणा विविहदेसिणेवच्छगहियवेसा पमुइयकंदप्प-कलह-केलि-कोलाहलप्पिया हास-बोलबहुला प्रसि-मोग्गरसत्ति-कोंत-हत्था अणेगमणि-रयणविविहणिजुत्तविचितचिधगया सुरूवा महिड्ढोया महज्जुतीया महायसा महाबला महाणुभागा महासोक्खा हारविराइयवच्छा कडय-तुडितर्थभियभुया अंगय-कुडलमट्टगंडयलकन्नपीढधारी विचित्तहत्थाभरणा विचित्तमाला-मउली कल्लाणगपवरवस्थपरिहिया कल्लाणगपवरमल्लाणुलेवणधरा भासुरबोंदी पलंबवणमालधरा दिवेणं वण्णणं दिवेणं गंधेणं दिवेणं फासेणं दिग्वेणं संघयणेणं दिवेणं संठाणेणं दिव्वाए इड्ढीए दिवाए जुतीए दिवाए पभाए दिव्वाए छायाए दिवाए प्रच्चोए दिव्वेणं तेएणं दिवाए लेस्साए दस दिसामो उज्जोवेमाणा पभासेमाणा, ते णं तत्थ साणं साणं भोमेज्जगणगरावाससतसहस्साणं साणं साणं सामाणियसाहस्सोणं साणं साणं अगमहिसोणं साणं साणं परिसाणं साणं साणं अणियाणं साणं साणं अणियाधिवतीणं साणं साणं पायरक्खदेव. साहस्सोणं असं च बहूर्ण बाणमंतराणं देवाण य देवीण य पाहेबच्चं पोरेवच्चं सामित्तं भट्टित्तं महतरगत्तं आणाईसरसेणावच्चं कारेमाणा पालेमाणा मयाऽहतणट्ट-गीय-वाइयतंती-तल-ताल-तुडियघणमुइंगपडुपवाइयरवेणं दिव्वाई भोगभोगाइ भुजमाणा विहरति / [188 प्र.] भगवन् ! पर्याप्त और अपर्याप्त वाणव्यन्तर देवों के स्थान कहाँ कहे गए हैं ? भगवन् ! वाणव्यन्तर देव कहाँ निवास करते हैं ? [188 उ.] गौतम ! इस रत्नप्रभापृथ्वी के एक हजार योजन मोटे रत्नमय काण्ड के ऊपर से एक सौ योजन अवगाहन (प्रवेश) करके तथा नीचे भी एक सौ योजन छोड़ कर, बीच में आठ सौ योजन (प्रदेश) में, वाणव्यन्तर देवों के तिरछे असंख्यात भीमेय (भूमिगृह के समान) लाखों नगरावास हैं, ऐसा कहा गया है। वे भौमेयनगर बाहर से गोल और अंदर से चौरस तथा नीचे से कमल की कणिका के आकार में संस्थित हैं। (उन नगरावासों के चारों ओर) गहरी और विस्तीर्ण खाइयां एवं परिखाएं खुदी हुई हैं, जिनका अन्तर स्पष्ट (प्रतीत होता) है। (यथास्थान) प्राकारों, अट्टालकों, कपाटों, तोरणों प्रतिद्वारों से (वे नगरावास) युक्त हैं / (तथा वे नगरावास) विविध यन्त्रों, शतघ्नियों, मूसलों एवं मुसुण्ढी नामक शस्त्रों से परिवेष्टित (घिरे हुए) होते हैं। (वे शत्रुओं द्वारा) अयोध्य (युद्ध न कर सकने योग्य), सदाजयशील, सदागुप्त (सुरक्षित), अडतालीस कोष्ठकों (कमरों) से रचित, अडतालीस वनमालाओं से सुसज्जित, क्षेममय, शिव (मंगल)मय, और किंकर देवों के दण्डों से उपरक्षित है। लिपे-पुते होने के पाठान्तर-मलय वृत्ति में 'कामगमा' पाठ है, जिसका अर्थ किया है-काम-इच्छानुसार गम-प्रवृत्ति करने वाले अर्थात-स्वेच्छाचारी। Jain Education International ___For Private & Personal use Only For Private & Personal Use Only . www.jainelibrary.org
SR No.003483
Book TitleAgam 15 Upang 04 Pragnapana Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorShyamacharya
AuthorMadhukarmuni, Gyanmuni, Shreechand Surana, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1983
Total Pages1524
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size37 MB
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