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________________ द्वितीय स्थानपद [ 163 भवन, परिवार आदि महान् ऋद्धियों से युक्त / महज्जुइया - जिनके शरीरगत और आभूषणगत महती द्यति है। महबला शारीरिक और प्राणगत मरती शक्ति वाले। महा =महान् अनुभाग-सामर्थ्यशील, अर्थात् जिनमें शाप और अनुग्रह का महान् सामर्थ्य हो / दिब्वेण संघयणेणं = दिव्य संहनन से / यहाँ देवों के संहनन का कथन शक्तिविशेष की अपेक्षा से कहा गया है। क्योंकि संहनन अस्थिरचनात्मक (हड्डियों की रचना विशेष) होता है, देवों के हड्डियाँ नहीं होतीं / इसीलिए जीवाभिगमसूत्र में कहा है-'देवा असंघयणी, जम्हा तेसि नेवट्ठी नेव सिरा....' (देव असंहनन होते हैं, क्योंकि उनके न तो हड्डी होती है, न ही नसें (शिराएँ) होती हैं, दिव्वाए पभाए = दिव्य प्रभा से, भवनावासगत प्रभा से / दिव्वाए छायाए-दिव्य छाया से—देवों के समूह की शोभा से / दिवाए अच्चीए = शरीरस्थ रत्नों आदि के तेज की ज्वाला से / दिव्वेण तेएण= शरीर से निकलते हुए दिव्य तेज से। दिवाए लेसाए - देह के वर्ण की दिव्य सुन्दरता से / प्राणाईसरसेणावच्चं = आज्ञा से ईश्वरत्व (प्राज्ञा पर प्रभुत्व) एवं सेनापतित्व करते हुए। भवनवासियों के मुकुट और अाभूषणों में अंकित चिह्न-मूलपाठ में असुरकुमारादि की पहिचान के लिए चिह्न बताए हैं / वे उनके मुकुटों तथा अन्य प्राभूषणों में अंकित होते हैं।' समस्त वाणव्यन्तर देवों के स्थानों की प्ररूपरणा 188. कहि णं भंते ! वाणमंतराणं देवाणं पज्जत्ताऽपज्जत्ताणं ठाणा पण्णत्ता? कहि णं भंते ! वाणमंतरा देवा परिवसंति ? गोयमा ! इमीसे रयणप्पभाए पुढबीए रयणामयस्स कंडस्स जोयणसहस्सबाहल्लस्स उरि एगं जोयणसतं प्रोगाहित्ता हेट्ठा वि एगं जोयणसतं वज्जेता मझे अटुसु जोयणसएसु, एत्थ णं वाणमंतराणं देवाणं तिरियमसंखेज्जा भोमेज्जणगरावाससतसहस्सा भवंतीति मक्खातं / ते णं भोमेज्जा णगरा बाहि वट्टा अंतो चउरंसा अहे पुक्खरकण्णियासंठाणसंठिता उक्किण्णंतरविउलगंभीरखाय-परिहा पागार-ऽट्टालय-कवाड-तोरण-पडिदुवारदेसभागा जंत-सयग्घि-मुसल-मुसु ढिपरियरिया प्रयोज्झा सदाजता सदागुत्ता अडयालकोटुगरइया अडयालकयवणमाला खेमा सिवा किकरामरदंडोवरक्खिया लाउल्लोइयमहिया गोसोस-सरसरत्तचंदणदद्दरदिन्नपंचंगुलितला उचितचंदणकलसा चंदणघडसुकयतोरणपडिदुवारदेसभागा आसत्तोसत्तविउलवट्टबग्घारियमल्लदामकलावा पंचवण्णसरससुरभिमुक्कपुप्फपुजोक्यारकलिया कालागरु-पवरकु दुरुक्क-तुरुक्कधूक्मघमधेतगंधुळ्याभिरामा सुगंधवरगंधगंधिया गंधवट्टिभूता अच्छरगणसंघसंविकिण्णा दिव्धतुडितसद्दसंपणदिता पडागमालाउलाभिरामा सम्वरयणामया अच्छा सण्हा लण्हा घट्टा मट्टा नीरया निम्मला निष्पंका णिक्कंकड़च्छाया सप्पभा समरीया सउज्जोता पासादीया दरिसणिज्जा अभिरूवा पडिरूवा, एस्थ णं वाणमंतराणं देवाणं पज्जत्ताऽपज्जत्ताणं ठाणा पण्णत्ता। तिसु वि लोगस्स असंखेज्जइभागे। तत्थ णं बहवे वाणमंतरा देवा परिचसंति / तं जहापिसाया 1 भूया 2 जक्खा 3 रक्खसा 4 किन्नरा 5 किपुरिसा 6 भुयगवइणो य महाकाया 7 गंधव्व 1. प्रज्ञापनासूत्र मलय. बृत्ति, पत्रांक 85 से 95 तक Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003483
Book TitleAgam 15 Upang 04 Pragnapana Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorShyamacharya
AuthorMadhukarmuni, Gyanmuni, Shreechand Surana, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1983
Total Pages1524
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size37 MB
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