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________________ 162] [प्रज्ञापनासूत्र वस्त्र शिलिन्ध्रपुष्प की प्रभा के समान (नीले) होते हैं, सुपर्णकुमारों, दिशाकुमारों और स्तनितकुमारों के वस्त्र अश्व के मुख के फेन के सदृश अतिश्वेत होते हैं / / 147 / / विद्युत्कुमारों, अग्निकुमारों और द्वीपकुमारों के वस्त्र नीले रंग के होते हैं और वायुकुमारों के वस्त्र सन्ध्याकाल की लालिमा जैसे वर्ण के जानने चाहिए / / 148 // विवेचन --सर्व भवनवासी देवों के स्थानों की प्ररूपणा–प्रस्तुत ग्यारह सूत्रों (स. 177 से 187 तक) में शास्त्रकार ने सामान्य भवनवासी देवों से लेकर असुरकमारादि दस प्रकार कं, तथा उनमें भी दक्षिण और उत्तर दिशाओं के, फिर उनके भी प्रत्येक निकाय के इन्द्रों के (विविध अपेक्षाओं से) स्थानों, भवनावासों की संख्या और विशेषता तथा प्रत्येक प्रकार के भवनवासी देवों और इन्द्रों के स्वरूप, वैभव एवं सामर्थ्य, प्रभाव आदि का विस्तृत वर्णन किया है। अन्त में संग्रहणी गाथाओं द्वारा प्रत्येक प्रकार के भवनवासी देवों के भवनों, सामानिकों और प्रात्मरक्षक देवों की संख्या, दाक्षिणात्य और औदीच्य कुल 20 इन्द्रों के नाम तथा दस प्रकार के भवनवासियों के प्रत्येक के शारीरिक और वस्त्र सम्बन्धी वर्ण का उल्लेख किया है।' कुछ कठिन शब्दों की व्याख्या-पुक्खरकणियासंठाणसंठिया= पुष्कर-कमल की कणिका के समान आकार में संस्थित हैं। कणिका उन्नत एवं समान चित्रविचित्र बिन्दु रूप होती है। 'उक्किण्णंतरविउलगंभीरखातपरिहा' == उन भवनों के चारों ओर खाइयाँ और परिखाएँ हैं। जिनका अन्तर उत्कीर्ण की तरह स्पष्ट प्रतीत होता है / वे विपुल यानी अत्यन्त गंभीर (गहरी) हैं। जो ऊपर से चौड़ी और नीचे से संकड़ी हो, उसे परिखा कहते हैं और जो ऊपर-नीचे समान हो, उसे खात (खाई) कहते हैं / यही परिखा और खाई में अन्तर है। पागारऽट्टालय-कवाड-तोरण-पडिदुवारदेसभागा–प्रत्येक भवन में प्राकार, अद्रालक, कपाट, तोरण और प्रतिद्वार यथास्थान बने हुए हैं। प्राकार कहते हैं-साल या परकोटे को। उस पर भृत्यवर्ग के लिए बने हुए कमरों को अट्टालक या अटारी कहते हैं / बड़े दरवाजों (फाटकों) के निकट छोटे द्वार 'तोरण' कहलाते हैं। बड़े द्वारों के सामने जो छोटे द्वार रहते हैं, उन्हें प्रतिद्वार कहते हैं। अउज्झा जहाँ शत्रुओं द्वारा युद्ध करना अशक्य हो, ऐसे अयोध्य भवन / खेमा-शत्रुकृत उपद्रव से रहित / सिवा-सदा मंगलयुक्त / चंदणघडसुकयतोरणपडिदुवारदेसभागा-जिन भवनों के प्रतिद्वारों के देशभाग में चन्दन के घड़ों से अच्छी तरह बनाए हए तोरण हैं। 'सब्बर यणामया"लण्हावे असुरकूमारों के भवन पूर्ण रूप से रत्नमय अच्छा स्फटिक के समान स्वच्छ, सहा-स्निग्ध पुद्गलस्कन्धों से निर्मित, और कोमल होते हैं। निप्पंका = कलंक या कीचड़ से रहित / निक्कंकडछाया = वे भवन उपघात या आवरण से रहित (निष्ककट) छाया यानी कान्ति वाले होते हैं / समरिया- उनमें से किरणों का जाल बाहर निकलता रहता है / सउज्जोया = उद्योतयुक्त अर्थात् --बाहर स्थित वस्तुओं को भी प्रकाशित करने वाले / पासादीया =मन को प्रसन्न करने वाले। दरिसणिज्जा = दर्शनीय = दर्शनयोग्य, जिन्हें देखने में नेत्र थकें नहीं। दिव्वतुडियसहसंपणादिया = दिव्य वीणा, वेणु, मृदंग आदि वाद्यों की मनोहर ध्वनि सदा गूजते रहने वाले / पडिरूवा प्रतिरूप-उनमें प्रतिक्षण नया-नया रूप दृष्टिगोचर होता है / धवलपुप्फदंता=कुद आदि के श्वेतवर्ण-पुष्पों के समान श्वेत दांत वाले, असियकेसा= काले केश वाले / ये दांत और केश औदारिक पुद्गलों के नहीं, वैक्रिय के समझने चाहिए। महिड्ढिया = -- - - 1. पण्णवणासुत्तं (मूलपाठ-टिप्पणयुक्त) भा. 1, पृ. 55 से 63 तक Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003483
Book TitleAgam 15 Upang 04 Pragnapana Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorShyamacharya
AuthorMadhukarmuni, Gyanmuni, Shreechand Surana, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1983
Total Pages1524
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size37 MB
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