SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 185
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ 152] [ प्रज्ञापनासूत्र घण-संख-गोखीर-कुद-दगरय-मुणालियाधवलदंतसेढी हुयवहणिधंतधोयतत्ततवणिज्जरत्ततल-तालुजोहा अंजण-घणकसिणरुयगरमणिज्जणिद्धकेसा वामेयकुडलधरा, प्रद्दचंदणाणुलित्तगत्ता, ईसीसिलिंधपुप्फपगासाई असंकिलिट्ठाई सुहुमाइं वत्थाई पवर परिहिया, वयं च पढम समइक्कंता, बिइयं तु असंपत्ता, भद्दे जोवणे वट्टमाणा, तलभंगय-तुडित-पवरभूसण-निम्मलमणि-रयणमंडितभया दसमुद्दामंडियागहत्था चूडामणिचिचिंधगता सुरुवा महिड्ढीया महज्जुईया महायसा महाबला महाणुभागा महासोक्खा हारविराइयवच्छा कडय-तुडियर्थभियभुया अंगद-कुंडल-मट्टगंडतलकण्णपीढधारी विचित्त. हत्थाभरणा विचित्तमाला-मउली कल्लाणगपवरवत्थपरिहिया कल्लाणगपवरमल्लाणुलेवणा भासुरबोंदी पलंबवणमालधरा दिवेणं वण्णणं दिवेणं गंधेणं दिव्वेणं फासेणं दिवेणं संघयणेणं दिवेणं संठाणेणं दिवाए इड्ढीए दिवाए जुतीए दिवाए पभाए दिखाए छायाए दिवाए अच्चीए दिवेणं तेएणं दिवाए लेसाए दस दिसाम्रो उज्जोवेमाणा पभासेमाणा / ते णं तत्थ साणं साणं भवणावाससतसहस्साणं साणं साणं सामाणियसाहस्सीणं साणं साणं तायत्तीसाणं साणं साणं लोगपालाणं साणं साणं अगमहिसोणं साणं साणं परिसाणं साणं साणं अणियाणं साणं साणं अणियाधिवतीणं साणं साणं प्रातरक्खदेवसाहस्सीणं अण्णसिं च बहूणं भवणवासीणं देवाण य देवीण य ाहेवच्चं पोरेवच्चं सामित्तं भट्टित्तं महघरगत्तं आणाईसरसेणावच्चं कारेमाणा पालेमाणा महताऽहतनट्ट-गीत-वाइततंती-तल-तालतुडित-घणमइंगपडप्पवाइतरवेणं दिव्वाई भोगभोगाई भुजमाणा विहरति / [178-2] यहाँ (इन्हीं स्थानों में) जो दो असुरकुमारों के राजा-चमरेन्द्र और बलीन्द्र निवास करते हैं, वे काले, महानील के समान, नील की गोली, गवल (भंस के सींग), अलसी के फूल के समान (रंग वाले), विकसित कमल (शतपत्र) के समान निर्मल, कहीं श्वेत, रक्त एवं ताम्रवर्ण के नेत्रों वाले, गरुड़ के समान विशाल सीधी और ऊँची नाक वाले, पुष्ट या तेजस्वी (उपचित) मूगा तथा बिम्बफल के समान अधरोष्ठ वाले ; श्वेत विमल एवं निर्मल चन्द्रखण्ड, जमे हुए दही, शंख, गाय के दूध, कुन्द, जलकण और मृणालिका के समान धवल दन्तपंक्ति वाले, अग्नि में तपाये और धोये हुए तपनीय (सोने) के समान लाल तलवों, तालु तथा जिह्वा वाले, अंजन तथा मेघ के समान काले, रुचकरत्न के समान रमणीय एवं स्निग्ध (चिकने) केशों वाले, बांए एक कान में कुण्डल के धारक, गीले (सरस) चन्दन से लिप्त शरीर वाले, शिलीन्ध्र-पुष्प के समान किंचित् लाल रंग के एवं क्लेश उत्पन्न न करने वाले (अत्यन्त सुखकर) सूक्ष्म एवं अत्यन्त श्रेष्ठ वस्त्र पहने हुए, प्रथम वय (कौमार्य) को पार किये हुए, दूसरी वय को अप्राप्त, (अतएव) नवयौवन में वर्तमान, तलभंगक, त्रुटित तथा अन्य श्रेष्ठ प्राभूषणों एवं निर्मल मणियों और रत्नों से मण्डित भुजाओं वाले, दस मुद्रिकाओं (अंगूठियों) से सुशोभित अग्रहस्त (हाथ की अंगुलियों) वाले, विचित्र चूड़ामणि के चिह्न से युक्त, सुरूप, महद्धिक, महाद्युतिमान्, महायशस्वी, महाबलवान्, महासामर्थ्यशाली (प्रभावशाली), महासुखी, हार से सुशोभित वक्षस्थल वाले, कड़ों तथा बाजूबंदों से स्तम्भित भुजाओं वाले, अंगद, कुण्डल तथा कपोल भाग को मर्षण करने वाले कर्णपीठ (कर्णाभूषण) के धारक, हाथों में विचित्र आभूषणों वाले, अद्भुत मालाओं से युक्त मुकुट वाले, कल्याणकारी श्रेष्ठ वस्त्र पहने हुए, कल्याणकारी श्रेष्ठ माला और अनुलेपन के धारक, देदीप्यमान (चमकते हुए) शरीर वाले, लम्बी वनमालाओं के धारक तथा दिव्य वर्ण से, दिव्य गन्ध से, दिव्य स्पर्श से, दिव्य संहनन से, दिव्य संस्थान (आकृति) से, दिव्य ऋद्धि से, दिव्य द्युति से, दिव्य प्रभा से, दिव्य कान्ति से, दिव्य अचि Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003483
Book TitleAgam 15 Upang 04 Pragnapana Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorShyamacharya
AuthorMadhukarmuni, Gyanmuni, Shreechand Surana, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1983
Total Pages1524
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size37 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy