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________________ द्वितीय स्थानपद [ 151 दिव्य वाद्यों के शब्दों से शब्दायमान, सर्वरत्नमय, स्वच्छ, चिकने (स्निग्ध), कोमल, घिसे हुए, पौंछे हुए, रज से रहित, निर्मल, निष्पंक (कलंकरहित), प्रावरणरहित-कान्तिमान्, प्रभायुक्त, श्रीसम्पन्न, रणों से युक्त उद्योतयक्त (प्रकाशमान), प्रसन्नता (आहाद) उत्पन्न करने वाले, दर्शनीय, अभिरूप (अतिरमणीय) एवं प्रतिरूप (सुन्दर) होते हैं / इन (पूर्वोक्त विशेषताओं से युक्त भवनावासों) में पर्याप्त और अपर्याप्त असुरकुमार देवों के स्थान कहे गए हैं / (वे) उपपात की अपेक्षा से लोक के असंख्यातवें भाग में हैं; समुद्घात की अपेक्षा से लोक के असंख्यातवें भाग में हैं (और) स्वस्थान की अपेक्षा से (भी) लोक के असंख्यातवें भाग में उन (पूर्वोक्त स्थानों) में बहुत-से असुरकुमार देव निवास करते हैं। (वे असुरकुमार देव) काले, लोहिताक्षरत्न तथा बिम्बफल के समान अोठों वाले, श्वेत (धवल) पुष्पों के समान दांतों तथा काले केशों वाले, बाएँ एक कुण्डल के धारक, गीले चन्दन से लिप्त शरीर (गात्र) वाले, शिलिन्धपुष्प के समान थोड़े-से प्रकाशमान (किञ्चित् रक्त) तथा संक्लेश उप्पन्न न करने वाले सूक्ष्म अतीव उत्तम वस्त्र पहने हुए, प्रथम (कौमार्य) वय को पार किये हुए (कुमारावस्था के किनारे पहुँचे हुए) और द्वितीय वय को असंप्राप्त (प्राप्त नहीं किये हुए) (अतएव) भद्र (प्रतिप्रशस्त) यौवन में वर्तमान होते हैं / (तथा वे) तलभंगक (भुजा का आभूषण विशेष), श्रुटित (बाहरक्षक) एवं अन्यान्य श्रेष्ठ आभूषणों में जटित निर्मल मणियों तथा रत्नों से मण्डित भुजाओं वाले, दस मुद्रिकाओं (अंगूठियों) से सुशोभित अग्रहस्त (अंगुलियों) वाले, चूडामणिरूप अद्भुत चिह्न वाले, सुरूप, मद्धिक, महाद्युतिमान, महायशस्वी, महाबली, महानुभाग (सामर्थ्य) युक्त, महासुखी, हार से सुशोभित वक्षस्थल वाले, कड़ों और बाजूबंदों से स्तम्भित भुजा वाले, अंगद एवं कुण्डल से चिकने कपोल वाले तथा कर्णपीठ के धारक, हाथों में विचित्र आभरण वाले, विचित्र पुष्पमाला मस्तक में धारण किये हुए, कल्याणकारी उत्तम वस्त्र पहने हुए, कल्याणकारी श्रेष्ठ माला और अनुलेपन के धारक देदीप्यमान (चमकते हुए) शरीर वाले, लम्बी वनमाला के धारक तथा दिव्यवर्ण से, दिव्य गन्ध से, दिव्य स्पर्श से, दिव्य संहनन से. दिव्य संस्थान (शरीर के डीलडौल) से. दिव्य ऋद्धि से. दिव्य धति से. दिव्य प्रभा से. दिव्य छाया (कान्ति) से, दिव्य अचि (ज्योति) से, दिव्य तेज से और दिव्य लेश्या से दसों दिशाओं को प्रकाशित करते हुए, सुशोभित करते हुए वे (भवनवासी देव) वहाँ अपने-अपने लाखों भवनावासों का, अपने-अपने हजारों सामानिक देवों का, अपने-अपने त्रास्त्रिश देवों का, अपने-अपने लोकपालों का, अपनी-अपनी अग्नमहिषियों का, अपनी-अपनी परिषदों का, अपनी-अपनी सेनाओं का, अपने-अपने सैन्याधिपतिदेवों का, अपने-अपने आत्मरक्षकदेवों का तथा और भी अन्य बहुत-से भवनवासी देवों और देवियों का प्राधिपत्य, पौरपत्य (अग्रेसरस्व), स्वामित्व (नेतृत्व), भर्तृत्व (पोषणकर्तृत्व), महत्तरत्व (महानता), प्राज्ञेश्वरत्व एवं सेनापत्य करते-कराते तथा पालन करते-कराते हुए, महान् आहत से (बड़े जोरों से अथवा महान् व्याघातरहित) नृत्य, गीत, वादित, तल, ताल, त्रुटित और धनमृदंग के बजाने से उत्पन्न महाध्वनि के साथ दिव्य एवं उपभोग्य भोगों का उपभोग करते हुए विहरण करते हैं। [2] चमर-बलिणो यस्य दुवे असुरकुमारिदा असुरकुमाररायाणो परिवसंति काला महानीलसरिसा गोलगुलिय-गवल-प्रयसिकुसमपगासा वियसियसयवत्तणिम्मलईसोसित-रत्त-तंबणयणा गरुलाययउज्जुतुगणासा प्रोयवियसिलप्पवालबिबफलसन्निभाहरोहा पंडरससिसगलविमल-निम्मलदहि Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003483
Book TitleAgam 15 Upang 04 Pragnapana Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorShyamacharya
AuthorMadhukarmuni, Gyanmuni, Shreechand Surana, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1983
Total Pages1524
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size37 MB
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