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________________ 150] [ प्रज्ञापनासूत्र पवरपरिहिया, वयं च पढम समइक्कता, बिइयं च प्रसंपत्ता, भद्दे जोवणे वट्टमाणा, तलभंगय-तुडितपवर भूसण-निम्मलमणि-रयणमंडितभुया दसमुद्दामंडियग्नहत्था चूडामणिचिचिधगता सुरुवा महिड्डीया महज्जुइया महायसा महब्बला महाणुभागा महासोक्खा हारविराइयवच्छा कडय-तुडियथंभियभुया अंगय-कुंडल-मट्टगंडयल कण्णपीढधारी विचित्तहत्याभरणा विचित्तमाला-म उलो कल्लाणगपवर वत्थपरिहिया कल्लाणगपवरमल्लाणुलेवणधरा भासुरबोंदी पलंबवणमालधरा दिवेणं वण्णेणं दिवेणं गंधेणं दिवेणं फासेणं दिवेणं संघयणेणं दिवेणं संठाणेणं दिवाए इड्डीए दिवाए जुईए दिव्वाए पभाए दिव्याए छायाए दिवाए प्रच्चीए दिव्वेणं तेएणं दिव्वाए लेसाए दस दिसाम्रो उज्जोवेमाणा पभासेमाणा। ते णं तस्थ साणं साणं भवणावाससतसहस्साणं साणं साणं सामाणियसाहस्सीणं साणं साणं तायत्तीसाणं साणं साणं लोगपालाणं साणं साणं अगमहिसीणं साणं साणं परिसाणं साणं साणं अणियाणं साणं साणं प्रणियाधिवतोणं साणं साणं पायरक्खदेवसाहस्सीणं अण्णेसि च बहूणं भवणवासीणं देवाण य देवीण य आहेबच्चं पोरेवच्चं सामिच्चं भट्टित्तं महत्तरगत्तं प्राणाईसरसेणावच्चं कारेमाणा पालेमाणा महताऽतणट्ट-गीत-वाइयतंती-तल-ताल-तुडिय-घणमुइंगपचुप्पवाइयरवेणं दिव्वाइं भोगभोगाई भुजमाणा विहरति / [178-1 प्र.] भगवन् ! पर्याप्त और अपर्याप्त असुरकुमार देवों के स्थान कहाँ कहे गए हैं ? असुरकुमार देव कहाँ निवास करते हैं ? [178-1 उ.] गौतम ! एक लाख अस्सी हजार योजन मोटी इस रत्नप्रभापृथ्वी के ऊपर एक हजार योजन अवगाहन करके और नीचे एक हजार योजन (प्रदेश) छोड़ कर, बीच में (स्थित) जो एक लाख अठहत्तर हजार योजन (प्रदेश है,) वहाँ असुरकुमारदेवों के चौंसठ लाख भवन-पावास हैं, ऐसा कहा गया है। वे भवन (भवनावास) बाहर से गोल, अंदर से चौरस (चौकोर), और नीचे से पुष्कर-(नीलकमल) कणिका के आकार में संस्थित हैं / (उन भवनों के चारों ओर) गहरी और विस्तीर्ण खाइयाँ और परिखाएँ खुदी हुई हैं, जिनका अन्तर स्पष्ट (प्रतीत होता) है। (यथास्थान) प्राकारों (परकोटों), अटारियों, कपाटों, तोरणों और प्रतिद्वारों से भवनों के एकदेशभाग सुशोभित होते हैं, (तथा वे भवन) यंत्रों, शतघ्नियों (महाशिलाओं या महायष्टियों), मूसलों और मुसुण्ढी नामक शस्त्रों से (चारों ओर से) वेष्टित (घिरे हुए) होते हैं; तथा शत्रुओं द्वारा अयोध्य (युद्ध न कर सकने योग्य), सदाजय, सदागुप्त (सदैव सुरक्षित) तथा अड़तालीस कोठों से रचित, अड़तालीस वनमालाओं से सुसज्जित, क्षेममय, शिवमय, किंकर-देवों के दण्डों से उपरक्षित हैं / (गोबर आदि से) लीपने और (चूने आदि से) पोतने के कारण (वे भवन) प्रशस्त रहते हैं। (उन भवनों पर) गोशीर्षचन्दन और सरस रक्तचन्दन से (लिप्त) पांचों अंगुलियों (वाले हाथ) के छापे लगे होते हैं; (यथास्थान) चन्दन के (मांगल्य य) कलश रखे होते हैं। उनके तोरण और प्रतिद्वारदेश के भाग चन्दन के घड़ों से सुशोभित (सुकृत) होते हैं। (वे भवन) ऊपर से नीचे तक लटकती हुई लम्बी विपुल एवं गोलाकार पुष्पमालाओं के समूह से युक्त होते हैं ; तथा पंचरंगे ताजे सरस सुगन्धित पुष्पों के द्वारा उपचार से भी युक्त होते हैं / (वे भवन) काले अगर, श्रेष्ठ चीड़ा, लोबान तथा धूप की महकती हुई सुगन्ध से रमणीय, उत्तम सुगन्ध से सुगन्धित, गन्धवट्टी (अगरबत्ती) के समान लगते हैं। (वे भवन) अप्सरागण के संघों से व्याप्त, Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003483
Book TitleAgam 15 Upang 04 Pragnapana Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorShyamacharya
AuthorMadhukarmuni, Gyanmuni, Shreechand Surana, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1983
Total Pages1524
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size37 MB
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