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________________ द्वितीय स्थानपद ] [ 149 (नानारूप) आभूषण वाले, विचित्र पुष्पमाला और मस्तक पर मुकुट धारण किये हुए, कल्याणकारी उत्तम वस्त्र पहने हुए, कल्याणकारी श्रेष्ठ माला और अनुलेपन के धारक, देदीप्यमान शरीर वाले, लम्बी वनमाला के धारक तथा दिव्य वर्ण से, दिव्य गन्ध से, दिव्य स्पर्श से, दिव्य संहनन से, दिव्य संस्थान (प्राकृति) से, दिव्य ऋद्धि से, दिव्य द्यति (कान्ति) से, दिव्य प्रभा से, दिव्य छाया (शोभा) से, दिव्य अचि (ज्योति) से, दिव्य तेज से एवं दिव्य लेश्या से दसों दिशाओं को प्रकाशित करते हुए, सुशोभित करते हुए वे (भवनवासी देव) वहाँ अपने-अपने लाखों भवनावासों का, अपने-अपने हजारों सामानिकदेवों का, अपने-अपने त्रास्त्रिश देवों का, अपने-अपने लोकपालों का अनमहिषियों का, अपनी-अपनी परिषदानों का, अपने-अपने सैन्यों (अनीकों) का, अपने-अपने सेनाधिपतियों का, अपने-अपने प्रात्मरक्षक देवों का, तथा अन्य बहुत-से भवनवासी देवों और देवियों का आधिपत्य, पौरपत्य (अग्रेसरत्व), स्वामित्व (नायकत्व), भतत्व (पोषकत्व), महात्तरत्व (महानता), आजैश्वरत्व (अपनी आज्ञा का पालन कराने का प्रभुत्व) एवं सेनापतित्व (अपनी सेना को आज्ञा पालन कराने का प्राधान्य) करते-कराते हए तथा पालन करते-कराते हए, अहत (3 (अव्याहत-व्याघात. रहित अथवा पाहत-पाख्यानकों से प्रतिबद्ध) नृत्य, गीत, वादित, एवं तंत्री, तल, ताल (कांसा), त्रुटित (वाद्य) और घनमृदंग बजाने से उत्पन्न महाध्वनि के साथ दिव्य एवं उपभोग्य भोगों को भोगते हुए विचरते हैं। 178. [1] कहि गं भंते ! असुरकुमाराणं देवाणं पज्जत्ताऽपज्जत्ताणं ठाणा पण्णत्ता ? कहि णं भंते ! असुरकुमारा देवा परिवसंति ? गोयमा ! इमोसे रयणप्पभाए पुढवीए प्रसोउत्तरजोयणसतसहस्सबाहल्लाए उरि एग जोयणसहस्सं प्रोगाहित्ता हेवा वेगं जोयणसहस्सं वज्जेता मज्झे अट्ठहत्तरे जोयणसतसहस्से, एत्य णं असुर. कुमाराणं देवाणं चोट्टि भवणावाससतसहस्सा हवंतीति मक्खायं / ते णं भवणा बाहि वट्टा अंतो चउरंसा अहे पुक्खरकणियासंठाणसंठिता उक्किण्णंतरविउल. गंभीरखाय-परिहा पागार-ट्टालय-कवाड-तोरण-पडिदुवारदेसभागा जंतसयग्घि मुसल-मुस विपरियरिया असोझा सदाजया सदागुत्ता अडयालकोटगर इया अडयालकवणमाला खेमा सिवा किकरामरदंडोवरक्खिया लाउल्लोइयमहिया गोसीस-सरसरत्तचंदणदददिण्णपंचंगुलितला उवचितचंदणकलसा चंदगघडसुकयतोरणपडिदुवारदेसभागा प्रासत्तोसत्तविउलवट्टवग्धारियमल्लदामकलावा पंचवण्णसरससुरभिमुक्कपुष्फपुजोवयारकलिया कालागरु-पवरकुंदुरुक्क-तुरुक्कधूवमघमघेतगंधुदधुयाभिरामा सुगंधवरगंधगंधिया गंधवट्टिभूता अच्छरगणसंघसंविगिण्णा दिन्वतुडितप्तद्दसंपणदिया सव्वरयणामया अच्छा सहा लण्हा घट्टा मट्ठा णीरया निम्मला निप्पंका णिक्कंकडच्छाया सप्पभा समरीया सउज्जोया पासाईया दरिसणिज्जा अभिरूवा पडिरूवा, एत्थ णं असुरकुमाराणं देवाणं पज्जत्ताऽपज्जत्ताणं ठाणा पण्णत्ता। ___ उववाएणं लोयस्स असंखेज्जइभागे, समुग्घाएणं लोयस्स असंखेज्जइभागे, सट्ठाणेणं लोयस्स असंखेज्जइभागे। तत्य गं बहवे असुरकुमारा देवा परिवसंति; काला लोहियक्ख-बिबोटा धवलपुप्फदंता असियकेसा वामेयकुडलधरा प्रदचंदणाणुलित्तगत्ता, ईसीसिलिधपुप्फपगासाई असंकिलिट्ठाई सुहमाई वत्थाई Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003483
Book TitleAgam 15 Upang 04 Pragnapana Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorShyamacharya
AuthorMadhukarmuni, Gyanmuni, Shreechand Surana, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1983
Total Pages1524
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size37 MB
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