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________________ द्वितीय स्थानपद] [143 काले 1 महाकाले 2 रोरुए 3 महारोरुए 4 अपइट्ठाणे 5 / ते णं गरगा अंतो वट्टा बाहिं चउरसा अहे खुरप्पसंठाणसंठिता निच्चंधयारतमसा क्वगयगहचंद-सूर-नक्खत्तजोइसपहा मेद-वसा-पूयपडल रुहिर-मंसचिखल्ललित्ताणुलेवणतला असुई बोसा परमदुन्भिगंधा कक्खडफासा दुरहियासा असुभा नरगा प्रसुमा नरगेसु वेयणानो, एत्य णं तमतमापुढविनेरइयाणं पज्जत्ताऽपज्जत्ताणं ठाणा पण्णत्ता। उववाएणं लोयस्स असंखेज्जइमागे, समुग्घाएणं लोयस्स असंखेज्जइभागे, सटाणेणं लोयस्स असंखेज्जइभागे। तत्थ णं बहवे तमतमापुढविनेरइया परिवसंति काला कालोभासा गंभीरलोमहरिसा भीमा उत्तासणया परमकिण्हा वण्णेणं पण्णत्ता समणाउसो ! __ते णं णिच्च भीता णिच्चं तत्था णिच्चं तसिया णिच्चं उब्विग्गा णिच्चं परममसुहं संबद्धं परगभयं पच्चणभवमाणा विहरति / प्रासोतं 1 बत्तीसं 2 अट्ठावीसं च होइ 3 वीसं च 4 / अट्ठारस 5 सोलसगं 6 अठ्ठत्तरमेव 7 हिटिमया // 133 // अडहुत्तरं च 1 तीसं 2 छव्वीसं चेव सतसहस्सं तु 3 / अट्ठारस 4 सोलसगं 5 चोइसमहियं तु छट्ठीए 6 // 134 // अद्धतिवण्णसहस्सा उरिमऽहे वज्जिऊण तो भणियं / मज्झे उ तिसु सहस्सेसु होति नरगा तमतमाए 7 // 135 // तीसा य 1 पण्णवीसा 2 पण्णरस 3 दसेब सयसहस्साई 4 / तिणि य 5 पंचूणेगं 6 पंचेव प्रणुत्तरा नरगा 7 // 136 // [174 प्र.] भगवन् ! तमस्तमपृथ्वी के पर्याप्त और अपर्याप्त नरयिकों के स्थान कहाँ कहे गए हैं ? [174 उ.] गौतम ! एक लाख, आठ हजार मोटी तमस्तमपृथ्वी के ऊपर के साढ़े बावन हजार योजन (प्रदेश) को अवगाहन (पार) करके तथा नीचे के भी साढ़े बावन हजार योजन (प्रदेश) को छोड़कर बीच के तीन हजार योजन (प्रदेश) में, तमस्तमप्रभा पृथ्वी के पर्याप्त और अपर्याप्त नारकों के पांच दिशाओं में पांच अनुत्तर, अत्यन्त विस्तृत महान् महानिरय (बड़े-बडे नरकावास) कहे गए हैं। वे इस प्रकार हैं--(१) काल, (2) महाकाल, (3) रौरव, (4) महारौरव और (5) अप्रतिष्ठान / वे नरक (नारकावास) अंदर से गोल और बाहर से चौरस हैं, नीचे से छुरे के समान तीक्ष्णसंस्थान से युक्त हैं। वे नित्य अन्धकार से प्रावृत रहते हैं; वहाँ ग्रह, चन्द्र, सूर्य, नक्षत्र आदि ज्योतिष्कों की प्रभा नहीं है। उनके तलभाग मेद, चर्बी, मवाद के पटल, रुधिर और मांस के कीचड़ के लेप से लिप्त रहते हैं। अतएव वे अपवित्र, घृणित, अतिदुर्गन्धित, कठोरस्पर्शयुक्त, दुःसह एवं Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003483
Book TitleAgam 15 Upang 04 Pragnapana Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorShyamacharya
AuthorMadhukarmuni, Gyanmuni, Shreechand Surana, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1983
Total Pages1524
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size37 MB
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