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________________ 136 ] [प्रज्ञापनासूत्र एत्य गं बहवे णेरइया परिवसंति काला कालोभासा गंभीरलोमहरिसा भीमा उत्तासणगा परमकण्हा वण्णणं पण्णत्ता समणाउसो!" तेणं तत्थ णिच्चं भीता णिच्चं तत्था णिच्चं तसिया पिच्चं उब्धिग्गा णिच्चं परममसुहं संबद्ध णरगमयं पच्चणुभवमाणा विहरंति / [167 प्र.] भगवन् ! पर्याप्त और अपर्याप्त नारकों के स्थान कहाँ, किस और कितने, तथा कैसे प्रदेश में कहे गए हैं ? नैरयिक कहाँ निवास करते हैं ? [167 उ.] गौतम ! स्वस्थान की अपेक्षा से (वे) सात (नरक) प्रथ्वियों में रहते हैं। तथा इस प्रकार हैं-(१) रत्नप्रभा में, (2) शर्कराप्रभा में, (3) वालुकाप्रभा में, (4) पंकप्रभा में, (5) धूमप्रभा में, (6) तमःप्रभा में और (7) तमस्तम:प्रभा में। इन (सातों नरक-पृथ्वियों) में चौरासी लाख नरकावास होते हैं, वे नरक (नारकावास) अन्दर से गोल और बाहर से चोकौर (होते हैं / ), नीचे से छुरे के आकार (संस्थान) से युक्त (संस्थित) हैं। सतत अन्धकार होने से वे गाढ़ अंधकार (से ग्रस्त होते हैं।) (वे नारकाबास) ग्रह, चन्द्र, सूर्य, नक्षत्र आदि ज्योतिष्कों की प्रभा से रहित हैं / उनके तलभाग (फर्श) मेद, चर्बी, मवाद के पटल, रुधिर (रक्त) और मांस के कीचड़ के लेप से लिप्त, अशुचि (गंदे), बीभत्स (घिनौने), अत्यन्त दुर्गन्धित, (धधकती) कापोत वर्ण की अग्नि जैसे रंग के, कठोरस्पर्श वाले, दुःसह एवं अशुभ नरक हैं। नरकों में अशुभ वेदनाएँ होती हैं। इन (ऐसे अशुभ नरकावासों) में पर्याप्त-अपर्याप्त नारकों के स्थान कहे गए हैं। उपपात की अपेक्षा से-लोक के असंख्यातवें भाग में, समुद्घात की अपेक्षा से- लोक के असंख्यातवें भाग में, और स्वस्थान की अपेक्षा से (भी) लोक के असंख्यातवें भाग में, इनमें (पूर्वोक्त नरकावासों में) बहुत-से नैरयिक निवास करते हैं / हे आयुष्मन् श्रमणो! वे (नारक) काले, काली आभा वाले, (भयवश) गम्भीर रोमाञ्च वाले, भीम (भयानक), उत्कट त्रासजनक, तथा वर्ण (रंग) से अतीव काले कहे गए हैं / वे (वहाँ) नित्य भीत (डरते), सदैव त्रस्त, सदा (परमाधार्मिक असुरों से परस्पर) त्रासित (त्रास पहुँचाए हुए), सदैव उद्विग्न (घबराए हुए) तथा नित्य अत्यन्त अशुभ, अपने नरक का भय प्रत्यक्ष अनुभव करते रहते हैं / 168. कहि णं भंते ! रयणप्पभापुढविणेरइयाणं पज्जत्ताऽपज्जत्ताणं ठाणा पण्णत्ता ? कहि णं भंते ! रयणप्प भापुढविणेरइया परिवसंति ? गोयमा ! इमोसे रयणप्पमाए पुढवीए असीउत्तरजोयणसतसहस्सबाहल्लाए उरि एगं जोयणसहस्सं प्रोगाहित्ता हेडा वेगं जोयणसहस्सं वज्जेत्ता मज्झे अट्ठहत्तरे जोयणसतसहस्से, एत्थ णं रयणप्पभापुढविनेरइयाणं तीसं णिरयावाससतसहस्सा भवंतीति मक्खातं / तेणं गरगा तो वट्टा बाहिं चउरंसा अहे खुरप्पसंठाणसंठिता णिच्चंधयारतमसा ववगय-गहचंद-सूर-णक्खत्तजोइसप्पभा मेद-बसा-पूयपडल-रुहिर-मंसचिविखल्ललित्ताणुलेवणतला असुई वीसा परमम्मिगंधा काऊअगणिवण्णाभा कक्खडफासा टुरहियासा असुभा गरगा प्रसुभा णरगेसु वेयणायो, एत्थ णं रयणप्पभापुढविणेरइयाणं पज्जत्ताऽगज्जत्ताणं ठाणा पण्णत्ता / Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003483
Book TitleAgam 15 Upang 04 Pragnapana Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorShyamacharya
AuthorMadhukarmuni, Gyanmuni, Shreechand Surana, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1983
Total Pages1524
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size37 MB
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