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________________ द्वितीय स्थानपद [ 127 कि अढाई द्वीप-समुद्रों से निकले हुए, अढाई द्वीप-समुद्रप्रमाण विस्तृत एवं पूर्व, पश्चिम, दक्षिण और उत्तर में स्वयम्भूरमण समुद्रपर्यन्त जो दो कपाट हैं, वे केवलिसमुद्घातसमय के कपाट की तरह ऊपर भी लोक के अन्त को स्पृष्ट (छुए हुए) हैं और नीचे भी लोकान्त को स्पृष्ट (छुए हुए) हैं, ये ही 'दो ऊर्ध्वकपाट' कहलाते हैं। इसके अतिरिक्त तट्ट का अर्थ है-स्थाल (थाल) / अर्थात्स्थालसदृश तिर्यग्लोकरूप तट्ट (स्थाल) कहलाता है / आशय यह है कि स्वयम्भूरमणसमुद्र की वेदिकापर्यन्त अठारह सौ योजन मोटा समस्त तिर्यग्लोकरूप तट्ट (स्थाल) है। निष्कर्ष यह है कि उपपात की अपेक्षा से लोक के दो ऊर्ध्वकपाटों एवं तिर्यग्लोकरूप तट्ट में बादर तेजस्कायिक अपर्याप्तक जीवों के स्थान हैं / 'लोयस्स दोसुद्ध कवाडेसु तिरियलोयत?' इस पाठान्तर के अनुसार यह अर्थ भी हो सकता है-लोक के उन दोनों ऊर्ध्वकपाटों में जो स्थित हो, वह तछ–'तत्स्थ' / इस प्रकार---तिर्यग्लोक रूप तत्स्थ में-अर्थात-उन दो ऊर्ध्वकपाटों के अंदर स्थित तिर्यग्लोक में वे होते हैं / निष्कर्ष यह हुआ कि पूर्वोक्त दोनों ऊर्ध्वकपाटों में और तिर्यग्लोक में भी (स्थित) उन्ही कपाटों में अपर्याप्त बादर तेजस्कायिकजीवों का उपपातस्थान है, अन्यत्र नहीं। अभिमुखनामगोत्र अपर्याप्त बादरतेजस्कायिक का प्रस्तुत प्रधिकार--यहाँ यह समझ लेना चाहिए कि बादर अपर्याप्तक-तेजस्कायिक तीन प्रकार के होते हैं (1) एकभविक, (2) बद्घायुष्क और (3) अभिमुखनामगोत्र / जो जीव एक विवक्षित भव के अनन्तर आगामी भव में बादर अपर्याप्त-तेजस्कायिकरूप में उत्पन्न होंगे वे एकविक कहलाते हैं, जो जीव पूर्वभव की प्रायु का त्रिभाग आदि समय शेष रहते बादर अपर्याप्त-तेजस्कायिक की आयु बांध चुके हैं, वे बद्धायुष्क कहलाते हैं और जो पूर्वभव को छोड़ने के पश्चात् बादर अपर्याप्ततेजस्कायिक की आयु, नाम और गोत्र का साक्षात् वेदन (अनुभव) कर रहे हैं, अर्थात् बादर अपर्याप्ततेजस्कायिक-पर्याय का अनुभव कर रहे हैं, वे 'अभिमुखनामगोत्र' कहलाते हैं। इन तीन प्रकार के बादर अपर्याप्त-तेजस्कायिकों में से प्रथम के दो-एकभविक और बद्धायुष्क-द्रव्यनिक्षेप से ही बादर अपर्याप्त-तेजस्कायिक हैं, भावनिक्षेप से नहीं, क्योंकि ये दोनों उस समय प्रायु, नाम और गोत्र का वेदन नहीं करते; अतएव यहाँ इन दोनों का अधिकार नहीं है, किन्तु यहाँ केवल अभिमुखनामगोत्र बादर अपर्याप्तक-तेजस्कायिकी का ही अधिकार समझना चाहिए, क्योंकि वे ही स्वस्थानप्राप्ति के प्राभिमख्यरूप उपपात को प्राप्त करते हैं। यद्यपि ऋजसत्रनय की दष्टि से वे भी बादर अपर्याप्त-तेजस्कायिक के आयुष्य, नाम एवं गोत्र का वेदन करने के कारण पूर्वोक्त कपाटयुगलतिर्यग्लोक के बाहर स्थित होते हुए भी बादर अपर्याप्त-तेजस्कायिक नाम को प्राप्त कर लेते हैं, तथापि यहाँ व्यवहारनय की दृष्टि को स्वीकार करने के कारण जो स्वस्थान में समश्रेणिक कपाटयुगल में स्थित हैं, और जो स्वस्थान से अनुगत तिर्यग्लोक में प्रविष्ट हैं, उन्हीं को बादर अपर्याप्त-तेजस्कायिक नाम से कहा जाता है; शेष जो कपाटों के अन्तराल में स्थित हैं, उनका नहीं, क्योंकि वे विषमस्थानवर्ती हैं / इस प्रकार जो अभी तक उक्त कपाटयुगल में प्रवेश नहीं करते और न तिर्यग्लोक में प्रविष्ट होते हैं, वे अभी पूर्वभव में ही स्थित हैं, अतएव उनकी गणना बादर अपर्याप्त-तेजस्कायिकों में नहीं की जाती / कहा भी है पणयाललक्खपिहला दुन्नि कवाडा य छहिसि पृट्टा। लोगंते तेसिंऽतो जे तेज ते उ विपति। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003483
Book TitleAgam 15 Upang 04 Pragnapana Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorShyamacharya
AuthorMadhukarmuni, Gyanmuni, Shreechand Surana, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1983
Total Pages1524
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size37 MB
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