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________________ द्वितीय स्थानपद] [ 121 146. कहि णं भंते ! बादरपुढविकाइयाणं अपज्जत्तगाणं ठाणा पण्णत्ता ? गोयमा ! जत्थेव बादरपुढविकाइयाणं पज्जत्तगाणं ठाणा तत्थेव बादरपुढविकाइयाणं अपज्जत्तगाणं ठाणा पण्णत्ता / तं जहा-उववाएणं सव्वलोए, समुग्घाएणं सम्वलोए, सहाणेणं लोयस्स असंखेज्जइभागे। 149 प्र.] भगवन् ! बादरपृथ्वी कायिकों के अपर्याप्तकों के स्थान कहाँ कहे हैं ? [146 उ.] गौतम ! जहाँ बादरपृथ्वीकायिक-पर्याप्तकों के स्थान कहे गए हैं, वहीं बादरपृथ्वीकायिक-अपर्याप्तकों के स्थान कहे हैं। जैसे कि उपपात की अपेक्षा से सर्वलोक में, समुद्घात को अपेक्षा से समस्त लोक में तथा स्वस्थान की अपेक्षा से लोक के असंख्यातवें भाग में हैं। 150. कहि णं भंते ! सुहमपुढविकाइयाणं पज्जत्तगाणं अपज्जत्तगाणं य ठाणा पण्णता? गोयमा ! सुहमपुढविकाइया जे पज्जत्तगा जे य अपज्जत्तगा ते सम्वे एगविहा प्रविसेसा अणाणत्ता सव्वलोयपरियावण्णगा पण्णता समणाउसो ! [150 प्र.] भगवन् ! सूक्ष्मपृथ्वीकायिक-पर्याप्तकों और अपर्याप्तकों के स्थान कहाँ कहे गए हैं ? [150 उ.] गौतम ! सूक्ष्मपृथ्वीकायिक, जो पर्याप्तक हैं और जो अपर्याप्तक हैं, वे सब एक हो प्रकार के हैं, विशेषतारहित (सामान्य) हैं, नानात्व (अनेकत्व) से रहित हैं और हे आयुष्मन् श्रमणो! वे समग्र लोक में परिव्याप्त कहे गए हैं। विवेचन--पृथ्वीकायिकों के स्थानों का निरूपण—प्रस्तुत तीन सूत्रों (सू. 148 से 150 तक) में बादर, सूक्ष्म, पर्याप्तक और अपर्याप्तक सभी प्रकार के पृथ्वीकायिकों के स्थानों का निरूपण किया गया है। __'स्थान' की परिभाषा और प्रकार-जीव जहाँ-जहाँ रहते हैं, जीवन के प्रारम्भ से अन्त तक जहाँ रहते हैं, उसे 'स्वस्थान' कहते हैं, जहाँ एक भव से छूट कर दूसरे भव में जन्म लेने से पूर्व बीच में स्वस्थानाभिमुख होकर रहते हैं, उसे 'उपपातस्थान' कहते हैं और समुद्घात करते समय जीव के प्रदेश जहाँ रहते हैं, जितने आकाशप्रदेश में रहते हैं, उसे 'समुद्घातस्थान' कहते हैं। पृथ्वीकायिकों के तीनों लोकों में निवासस्थान कहाँ-कहाँ और कितने प्रदेश में ? शास्त्रकार ने पृथ्वीकायिकों (बादर-सूक्ष्म-पर्याप्त अपर्याप्तों) के स्वस्थान तीन दृष्टियों से बताए हैं—(१) सात नरक पृथ्वियों में और आठवीं ईषत्प्रारभारा पृथ्वी में, तत्पश्चात् (2) अधोलोक, ऊर्ध्वलोक और तिर्यग्लोक के विभिन्न स्थानों में, तथा (3) स्वस्थान में भी लोक के असंख्यातवें भाग में / इसके अतिरिक्त बादर पर्याप्तक-अपर्याप्तक के उपपातस्थान क्रमश: लोक के असंख्यातवें भाग में तथा सर्वलोक में और समुद्घातस्थान पूर्वोक्त दोनों पृथ्वीकायिकों के क्रमश: लोक के असंख्यातवें भाग में तथा सर्वलोक में बताया गया है।' 1. (क) पण्णवणासुत्त (मूलपाठ) भा. 1, पृ. 64 (ख) पण्णवणासुत्त भा. 2, पद 2 को प्रस्तावना Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003483
Book TitleAgam 15 Upang 04 Pragnapana Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorShyamacharya
AuthorMadhukarmuni, Gyanmuni, Shreechand Surana, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1983
Total Pages1524
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size37 MB
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