________________ द्वितीय स्थानपद : प्राथमिक ] [119 पंचेन्द्रियों का स्थान भी लोक के असंख्यातवें भाग में है, किन्तु विशेषपंचेन्द्रिय के रूप में नारकों, तिर्यञ्चपंचेन्द्रियों, मनुष्यों एवं देवों के पृथक्-पृथक् सूत्रों में उन-उनके स्थानों का पृथक्-पृथक निर्देश है / सिद्ध लोक के अग्रभाग में हैं / ' * जीवभेदों के अनुसार स्थान-निर्देश इस क्रम से किया गया है--(१) पृथ्वीकायिक (बादर-सूक्ष्म, पर्याप्त-अपर्याप्त), (2) अप्कायिक (पूर्ववत्), (3) तेजस्कायिक (पूर्ववत्), (4) वायुकायिक (पूर्ववत्), (5) वनस्पतिकायिक (पूर्ववत्), (6) द्वीन्द्रिय, श्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय (पर्याप्तअपर्याप्त), (7) पंचेन्द्रिय (सामान्य), (8) नारक (सामान्य, पर्याप्त-अपर्याप्त), (9) प्रथम से सप्तम नरक तक (पर्याप्त-अपर्याप्त), (10) पंचेन्द्रिय तिर्यञ्च (पूर्ववत्), (11) मनुष्य (पूर्ववत्), (12) भवनवासी देव (पर्याप्त-अपर्याप्त), (13) असुरकुमार आदि दस भवनवासी (दाक्षिणात्य, औदीच्य, पर्याप्त-अपर्याप्त) (14) व्यन्तर (पर्याप्त-अपर्याप्त), (१५)पिशाचादि 8 व्यन्तर (दक्षिण-उत्तर के, पर्याप्त-अपर्याप्त), (16) ज्योतिष्कदेव, (17) वैमानिकदेव, (18) सौधर्म से अच्युत तक, (पर्याप्त अपर्याप्त) (19) ग्रे वेयकदेव (पर्याप्त-अपर्याप्त) (20) अनुत्तरौपपातिकदेव (पर्याप्त-अपर्याप्त) और (21) सिद्ध / ' 1. (क) पण्णवणासुत्तं (मूलपाठ) भा. 1, पृ. 46 से 80 तक (ख) पण्णवणासुतं पद दो की प्रस्तावना भा. 2, पृ. 49-50 (ग) उत्तराध्ययन अ. 36, गा. 'सुहमा सबलोगमि' 2. पण्णवणासुत्त (मूलपाठ) विषयानुक्रम, पृ. 31 Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org