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________________ प्रथम प्रज्ञापनापद [ 107 ये वज्रऋषभनाराचसंहनन और समचतुरस्रसंस्थान वाले होते हैं। ये दो दिन के अन्तर से आहार करते हैं / इनको पीठ को पसलियां 128 होती हैं और ये अपनी संतान का पालन 64 दिन तक करते हैं / पांच देवकुरु और पांच उत्तरकुरु क्षेत्रों में मनुष्यों की आयु तीन पल्योपम की एवं शरीर की ऊँचाई तीन गाऊ की होती है। ये भी वज्रऋषभनाराचसंहनन और समचतुरस्त्रसंस्थान वाले होते हैं। इनकी पीठ की पसलियां 256 होती हैं। ये तीन दिनों के अनन्तर आहार करते हैं और 46 दिनों तक अपनी संतति का पालन करते हैं। इन सभी क्षेत्रों में अन्तरद्वीपों की तरह मनुष्यों के भोगोपभोग के साधनों की पूर्ति कल्पवृक्षों से होती है। इतना अन्तर अवश्य है कि पांच हैमवत और पांच हैरण्यवत क्षेत्रों में मनुष्यों के उत्थान, बल-वीर्य आदि तथा वहां के कल्पवृक्षों के फलों का स्वाद और वहाँ की भूमि का माधुर्य अन्तरद्वीप की अपेक्षा पर्यायों की दृष्टि से अनन्तगुणा अधिक है / ये ही सब पदार्थ पांच हरिवर्ष और पांच रम्यकवर्ष क्षेत्रों में उनसे भी अनन्तगुणे अधिक तथा पांच देवकुरु और पांच उत्तरकुरु में इनसे भी अनन्तगुणे अधिक होते हैं / यह संक्षेप में अकर्मभूमकों का निरूपण है।' __ आर्य और म्लेच्छ मनुष्य-पांच भरत, पांच ऐरवत और पांच महाविदेह, इन 15 क्षेत्रों में आर्य और म्लेच्छ दोनों प्रकार के कर्मभूमक मनुष्य रहते हैं। आर्य का अर्थ है- हेय धर्मों (अधर्मों या पापों) से जो दूर हैं, और उपादेय धर्मों (अहिंसा, सत्य आदि धर्मों) के निकट हैं या इन्हें प्राप्त किये हुये हैं। म्लेच्छ वे हैं-जिनके वचन (भाषा) और आचार अव्यक्त-अस्पष्ट हों / दूसरे शब्दों में कहें तो जिनका समस्त व्यवहार शिष्टजनसम्मत न हो, उन्हें म्लेच्छ समझना चाहिए। __ म्लेच्छ अनेक प्रकार के हैं, जिनका मूलपाठ में उल्लेख है। इनमें से अधिकांश म्लेच्छों की जाति के नाम तो अमुक-अमुक देश में निवास करने से पड़ गए हैं, जैसे—शक देश के निवासी शक, यवन देश के निवासी यवन इत्यादि / आर्यों के प्रकार और उनके लक्षण क्षेत्रार्य-मूलपाठ में परिगणित साढे पच्चीस जनपदात्मक आर्य क्षेत्र में उत्पन्न होने एवं रहने वाले क्षेत्रार्य कहलाते हैं। ये क्षेत्र आर्य इसलिए कहे गए हैं कि / इनमें तीर्थकर, चक्रवर्ती, बलदेव, वासुदेव आदि उत्तम पुरुषों का जन्म होता है। इनसे भिन्न क्षेत्र अनार्य कहलाते हैं / जात्यार्य-मूलपाठ में वर्णित अम्बष्ठ आदि 6 जातियां इभ्य-अभ्यर्चनीय एवं प्रसिद्ध हैं। इन जातियों से सम्बद्ध जन जात्यार्य कहलाते हैं। कुलार्य-शास्त्र-परिगणित उग्न आदि 6 कुलों में से किसी कुल में जन्म लेने वाले कुलार्य-कुल की अपेक्षा से आर्य कहलाते हैं। कार्यअहिंसा आदि एवं शिष्टसम्मत तथा प्राजीविकार्य किये जाने वाले कर्म प्रार्यकर्म कहलाते हैं। शास्त्रकार ने दोषिक, सौत्रिक आदि कुछ आर्यकर्म से सम्बन्धित मनुष्यों के प्रकार गिनाये हैं / विशेषता स्वयमेव समझ लेना चाहिए। शिल्पार्य--जो शिल्प अहिंसा आदि धर्मांगों से तथा शिष्टजनों के प्राचार के अनुकूल हो, वह आर्य शिल्प कहलाता है। ऐसे आर्य शिल्प से अपना जीवननिर्वाह करने वाले शिल्पार्यों में परिगणित किये गए हैं। कुछ नाम तो शास्त्रकार ने गिनाये ही हैं / शेष स्वयं चिन्तन द्वारा समझ लेना चासिए / भाषार्य–अर्धमागधी उस समय आम जनता की, शिष्टजनों की भाषा थी, आज उसी का प्रचलित रूप हिन्दी एवं विविध प्रान्तीय भाषाएँ हैं। अतः वर्तमान युग 1. प्रज्ञापनासूत्र मलय. वृत्ति, पत्रांक 54 Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003483
Book TitleAgam 15 Upang 04 Pragnapana Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorShyamacharya
AuthorMadhukarmuni, Gyanmuni, Shreechand Surana, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1983
Total Pages1524
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size37 MB
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