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________________ 106 ] [प्रशापनासूत्र नाम हैं-प्रादर्शमुख, मेण्ढमुख, अयोमुख और गोमुख / इनमें से ह्यकर्ण के आगे आदर्शमुख, गजकर्ण के आगे मेण्ढमुख, गोकर्ण के आगे अयोमुख और शष्कुलीकर्ण के आगे गोमुख द्वीप है। इन आदर्शमुख आदि चारों द्वीपों के आगे छह-छह सौ योजन की दूरी पर पूर्वोत्तरादि विदिशाओं में फिर चार द्वीप हैं--प्रश्वमुख, हस्तिमुख, सिंहमुख और व्याघ्रमुख / ये चारों द्वीप 600 योजन लम्बे-चौड़े और 1897 योजन की परिधि वाले, पूर्वोक्त पद्मवरवेदिका तथा वनखण्ड से मण्डित बाह्यप्रदेश वाले एवं जम्बूद्वीप की वेदिका से 600 योजन अन्तर पर हैं। इन अश्वमुखादि चारों द्वीपों के आगे क्रमश: पूर्वोत्तरादि विदिशाओं में 700-700 योजन की दूरी पर 700 योजन लम्बे-चौड़े तथा 2213 योजन की परिधि वाले, पूर्वोक्त पद्मवरवेदिका तथा वनखण्ड से घिरे हुए एवं जम्बूद्वीप की वेदिका से 700 योजन के अन्तर पर क्रमश: प्रश्वकर्ण, हरिकर्ण, प्रकर्ण और कर्णप्रावरण नाम के चार द्वीप हैं। फिर इन्हीं अश्वकर्ण अादि चार द्वीपों के आगे, यथाक्रम से पूर्वोत्तरादि विदिशाओं में 800800 योजन दुर जाने पर आठ सौ योजन लम्बे-चौड़े, 2526 योजन की परिधि वाले, पूर्वोक्त प्रमाण वाली पद्मवरवेदिका-वनखण्ड से मण्डित परिसर वाले, एवं जम्बूद्वीप की वेदिका से 800 योजन के अन्त पर उल्कामुख, मेघमुख, विद्य न्मुख और विद्यु हन्त नाम के चार द्वीप हैं / तदनन्तर इन्हीं उल्कामुख आदि चारों द्वीपों के आगे क्रमशः पूर्वोत्तरादि विदिशाओं में 600-600 योजन की दूरी पर, नौ सौ योजन लम्बे-चौड़े तथा 2845 योजन की परिधि वाले, पूर्वोक्त प्रमाण वाली पद्मवरवेदिका एवं वनखण्ड से सुशोभित परिसर वाले, जम्बूद्वीप की वेदिका से 600 योजन के अन्तर पर वार द्वीप और हैं। जिनके नाम क्रमश: ये हैं-घनदन्त, लष्टदन्त, गूढ़दन्त और शुद्धदन्त / इस हिमवान् पर्वत की दाढों पर चारों विदिशानों में स्थित ये सब द्वीप (744 =28) अट्ठाईस हैं। शिखरी पर्वत के 28 अन्तरद्वीपों का वर्णन—इसी प्रकार हिमवान् पर्वत के समान वर्ण और प्रमाण वाले तथा पद्महद के समान लम्बे-चौड़े और गहरे पुण्डरीकहद से सुशोभित शिखरी पर्वत पर लवणसमुद्र के जलस्पर्श से लेकर पूर्वोक्त दूरी पर यथोक्त प्रमाण वाली चारों विदिशाओं में स्थित, एकोरुक आदि नाम के अट्ठाईस द्वीप हैं। इनकी लम्बाई-चौड़ाई परिधि, नाम आदि सब पूर्ववत् हैं। अतएव दोनों ओर के मिल कर कुल अन्तरद्वीप छप्पन हैं। इन द्वीपों में रहने वाले मनुष्य भी इन्हीं नामों से पुकारे जाते हैं / जैसे पजाब में रहने वाले को पंजाबी कहा जाता है।' प्रकर्मभूमकों का वर्णन-अकर्मभूमक मनुष्य तीस प्रकार के हैं। अढाई द्वीप रूप मनुष्यक्षेत्र में पांच हैमवत, पांच हैरण्यवत, पांच हरिवर्ष, पांच रम्यकवर्ष, पांच देवकुरु और पांच उत्तरकुरु अकर्मभूमि के इन तीस क्षेत्रों में 30 ही प्रकार के मनुष्य रहते हैं। इन्हीं के नाम पर से इनमें रहने वाले मनुष्यों के प्रकार गिनाये गए हैं। इनमें से 5 हैमवत क्षेत्र और 5 हैरण्यवत क्षेत्र में मनुष्य एक गव्यूति (गाऊ) ऊँचे, एक पल्योपम को आयु और वज्रऋषभनाराचसंहनन तथा समचतुरस्रसंस्थान वाले होते हैं। इनकी पीठ की पांसलियाँ 64 होती हैं, ये एक दिन के अन्तर से भोजन करते हैं और 76 दिन तक अपनी संतान का पालन-पोषण करते हैं। पांच हरिवर्ष और पांच रम्यकवर्ष क्षेत्रों में मनुष्यों की प्रायु दो पल्योपम की, शरीर की ऊंचाई दो गव्यूति की होती है। 1. प्रज्ञापनासूत्र म. वृत्ति, पत्रांक 50 से 54 तक Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003483
Book TitleAgam 15 Upang 04 Pragnapana Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorShyamacharya
AuthorMadhukarmuni, Gyanmuni, Shreechand Surana, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1983
Total Pages1524
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size37 MB
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