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________________ प्रज्ञापनासूत्र 1702. [1] णिरयगतिणामए णं भंते ! कम्मस्स० पुच्छा। गोयमा ! जहण्णेणं सागरोवमसहस्सस्स दो सत्तभागा पलिप्रोवमस्स असंखेज्जतिभागेणं ऊणगर, उक्कोसेणं वीसं सागरोवमकोडाकोडीओ; वीस य वाससताई अबाहा० / [1702-1 3] भगवन् ! नरकगति-नामकर्म की स्थिति कितने काल की कही है ? [1702-1 उ.] गौतम ! इसकी जघन्य स्थिति पल्योपम के असंख्यातवें भाग कम एक सागरोपम के भाग की है और उत्कृष्ट बीस कोडाकोडी सागरोपम की है। इसका अबाधाकाल बीस सौ (दो हजार) वर्ष का है। [2] तिरियगतिणामए जहा णपुसगवेदस्स (सु. 1700 [11]) / [1702-2] तिर्यञ्चगति-नामकर्म की स्थिति (सू. 1700-11 में उल्लिखित) नपुंसकवेद की स्थिति के समान है। [3] मणुयगतिणामए पुच्छा। गोयमा ! जहणणं सागरोवमस्स दिवड्ढे सत्तभागं पलिनोवमस्स असंखेज्जइभागेणं ऊणगं, उक्कोसेणं पण्णरस सागरोवमकोडाकोडीओ; पण्णरस य वाससताई पाबाहा० / [1702-3 प्र.] भगवन् ! मनुष्यगति-नामकर्म की स्थिति कितने काल की कही है ? [1702-3 उ.] गौतम ! इसकी स्थिति जघन्य पल्योपम के असंख्यातवें भाग कम सागरोपम के "भाग की है और उत्कृष्ट पन्द्रह कोडाकोडी सागरोपम की है। इसका अबाधाकाल पन्द्रह सौ वर्ष का है। [4] देवगतिणामए णं० पुच्छा। गोयमा ! जहण्णणं सागरोवमसहस्सस्स एक्कं सत्तभागं पलिप्रोवमस्स असंखेज्जइभागेणं ऊगगं, उक्कोसेणं जहा पुरिसवेयस्स [सु. 1700. [10]) / [1702-4 प्र.] भगवन् ! देवगति-नामकर्म की स्थिति कितने काल की कही है ? [1702-4 उ.] गौतम ! इसकी जघन्य स्थिति पल्योपम के असंख्यातवें भाग कम सहस्रसागरोपम के भाग की है और उत्कृष्ट स्थिति (1700-10 में उल्लिखित) पुरुषवेद की स्थिति के तुल्य है। [5] एगिदियजाइणामए पुच्छा। गोयमा ! जहण्णणं सागरोवमस्स दोणि सत्तभागा पलिओवमस्स असंखेज्जइभागेणं ऊणगा, उक्कोसेणं वीसं सागरोवमकोडाकोडीयो; वीस य वाससताई अबाहा० / [1702-5 प्र.] एकेन्द्रिय-जाति-नामकर्म की स्थिति के विषय में प्रश्न / [1702-5 उ.] गौतम ! इसकी जघन्य स्थिति पल्योपम के असंख्यातवें भाग कम सागरोपम के भाग की है और उत्कृष्ट बीस कोडाकोडी सागरोपम की है। इसका अबाधाकाल बीस सौ (दो हजार) वर्ष का है / [कर्म-स्थिति में से अबाधाकाल कम इसका निषेककाल है।] Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003483
Book TitleAgam 15 Upang 04 Pragnapana Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorShyamacharya
AuthorMadhukarmuni, Gyanmuni, Shreechand Surana, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1983
Total Pages1524
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size37 MB
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