SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 116
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ प्रथम प्रज्ञापनापद] . [८६-प्र.] वे (पूर्वोक्त) समुद्गपक्षी कौन-से हैं? [८६-उ.] समुद्गपक्षी एक ही आकार-प्रकार के कहे गए हैं। वे यहाँ (मनुष्यक्षेत्र में) नहीं होते / वे (मनुष्यक्षेत्र से) बाहर के द्वीप-समुद्रों में होते हैं / यह समुद्गपक्षियों की प्ररूपणा हुई। 10. से कि तं विततपक्खी? विततपक्खी एगागारा पण्णत्ता / ते णं नत्थि इहं, बाहिरएसु दोव-समुद्दएसु भवंति / से तं विततपक्खी। [९०-प्र.] वे (पूर्वोक्त) विततपक्षी कैसे हैं ? [6o-उ.] विततपक्षी एक ही आकार-प्रकार के होते हैं / वे यहाँ (मनुष्यक्षेत्र में) नहीं होते। (मनुष्यक्षेत्र से) बाहर के द्वीप-समुद्रों में होते हैं / यह विततपक्षियों की प्ररूपणा हुई / / 61. [1] ते समासतो दुविहा पण्णत्ता / तं जहा-सम्मुच्छिमा य गम्भवक्कंतिया य / [61-1] ये (पूर्वोक्त चारों प्रकार के खेचरपंचेन्द्रिय-तिर्यञ्च) संक्षेप में दो प्रकार के कहे गए हैं / वे इस प्रकार सम्मूच्छिम और गर्भज / [2] तत्थ णं जे ते सम्मुच्छिमा ते सम्वे नपुंसगा। [91-2] इनमें से जो सम्मूच्छिम हैं, वे सभी नपुंसक होते हैं / [3] तत्थ णं जे ते गम्भवक्कंतिया ते णं तिविहा पण्णता। तं जहा-इत्थी 1 पुरिसा 2 नपुंसगा 3 / [61-3] इनमें से जो गर्भज हैं, वे तीन प्रकार के कहे गए हैं। जैसे कि-(१) स्त्री, (2) पुरुष और (3) नपुसक / [4] एएसि णं एवमाइयाणं खहयरपंचेंदियतिरिक्खजोणियाणं पज्जत्ताऽपज्जत्ताणं बारस जातोकुलकोडीजोणिप्पमुहसतसहस्सा भवतीति मक्खातं / सत्तट्ठ जातिकुलकोडिलक्ख नव पद्धतेरसाई च / दस दस य होंति णवगा तह बारस चेव बोद्धव्वा // 11 // से तं खहयरपंचेंदियतिरिक्खजोणिया। से तं पंचेंदियतिरिक्खजोणिया। से तं तिरिक्खजोणिया। [61-4] इस प्रकार चर्मपक्षी इत्यादि इन पर्याप्तक और अपर्याप्तक खेचर-पंचेन्द्रिय-तिर्यचयोनिकों के बारह लाख जाति-कुलकोटि-योनिप्रमुख होते हैं, ऐसा कहा है। [संग्रहणी गाथार्थ-] (द्वीन्द्रियजीवों की) सात लाख जातिकुलकोटि, (त्रीन्द्रियों की) पाठ लाख, (चतुरिन्द्रियों को) नौ लाख, (जलचर तिर्यञ्चपंचेन्द्रियों की) साढ़े बारह लाख, (चतुष्पदस्थलचर पंचेन्द्रियों की) दस लाख, (उर:परिसर्प-स्थलचर पंचेन्द्रियों को) दस लाख, (भुजपरिसर्पस्थलचर-पंचेन्द्रियों की) नौ लाख तथा (खेचर-पंचेन्द्रियों की) बारह लाख, (यों द्वीन्द्रिय से लेकर खेचर पंचेन्द्रिय तक की क्रमश:) समझनी चाहिए // 111 / / www.jainelibrary.org Jain Education International For Private & Personal Use Only
SR No.003483
Book TitleAgam 15 Upang 04 Pragnapana Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorShyamacharya
AuthorMadhukarmuni, Gyanmuni, Shreechand Surana, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1983
Total Pages1524
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size37 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy